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अरिहंत परमेष्ठी के ४६ मूलगुण अतिशय - Printable Version

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अरिहंत परमेष्ठी के ४६ मूलगुण अतिशय - scjain - 10-07-2014

अरिहंतपरमेष्ठी के ४६ मूलगुण अतिशय-
तीर्थंकर केवली के अतिरिक्त जन्म के दस अतिशय अन्य केवली के नही होते ,कुछ और अतिशय भी भी कम होते है !
१० जन्म से,१० केवलज्ञान के बाद,१४ देवकृत,८ प्रतिहारी और ४ अनंत चतुष्टय होते है इनमे से १० जन्म से मूल गुण केवल तीर्थंकर परमेष्ठी के होते है अन्य अरिहंत भगवान् के नहीं होते !
(1). तीर्थंकर अरिहंत भगवान् के जन्म के अतिशय १०:-
१-अत्यंत सुन्दर रूप -सभी तीर्थंकर पूरे विश्व में सुन्दरतं होते है !
२-शरीर सुगन्धित होना-उनके शरीर से सुगग्ध आती है!हमारे शरीर मे पसीने के कारण बदबू आती है उनके नहीं आती!
३-पसीने का अभाव होना- उनके शरीर में पसीना नहीं आता
४-मल-मूत्र का अभाव-गृहस्थ जीवन में,उनके देवों द्वारा अमृतमय आहार लेने के कारण मल मूत्र नहीं होता!
५-मधुरवाणी-मधुर प्रिय वचन बोलते है!
६-अतुल्यबल- वे सर्व शक्तिमान होते है,उनके तुल्य कोई बलशाली नहीं होता!
७-उनका सफ़ेद खून होता है-जैसे माँ के बच्चे के वात्सल्य के कारण,उसके शरीर में सफ़ेद रंग का दूध स्वयं आ जाता है ठीक उसी प्रकार तीर्थंकर के तीन लोक के समस्त जीवों के प्रति वात्सल्य के कारण,उनके खून सफ़ेद होता है!
८-उनके शरीर में १००८ शुभ लक्षण के चिन्ह होते है-९०० तिल और १०८ शुभ बड़े चिन्ह होते है!
९-समचतुरस्रसंस्थान- उनके शरीर का आकार आंखे,नाक,कान,नक्श आदि सर्वश्रेष्ठ होता है लगता है, जैसे किसी ने उनका सुन्दरतं निर्माण किया हो!
१०-वज्रऋषभनारांचसहनं-इनके शरीर में हड्डिया वज्र की होती है,कुछ भी कर ले टूटेगी नहीं!
ये गुण उनमे जन्म से इसलिए होते है क्योकि पिछले जन्म में उन्होंने सोलह कारण भावनाए भा कर तीर्थंकर प्रकृतिबंध कर महान पुन्य का संचय किया होता है!
तीर्थंकर भगवान् जब गर्भ मे आते है,तो उससे पूर्व स्वर्ग से सौधर्मेन्द्र आकर उनकी नगरी को पुन: बनाते है!माता-पिता वही रहते है!गर्भ में आने से छ माह पूर्व से लेकर, माता -पिता के महल के आँगन में दिन मे चार बार प्रात:,अपराह्न,सायं और रात्रि में साढ़े तीन करोड़ असली,अत्यंत मूल्यवान,रत्नों की वर्षा,प्रत्येक समय, उनके जन्म लेने तक अर्थात १५ माह देवता करते है जिससे,जिस नगरी में भगवान् जन्म लेने जा रहे है वह नगरी मालामाल हो जाए!समस्त प्रजा आकर रत्नों को ले जाती है!
(2). केवलज्ञान के दसगुण-अतिशय-
१-१००योजन=३२० किलोमीटर के वृत्ताकार क्षेत्र तक सुभिक्ष हो जाता है अर्थात अकाल नहीं पड़ सकता! लोगों को खाने-पीने की कमी नहीं आयेगी!
२-केवलज्ञान के बाद जमीन पर नहीं चलते,आकाश में गमन करते है !
३-समवशरण में विराजमान होने पर,यद्यपि पूर्व की ऒर ही उनका एक मुख होता है,किन्तु प्रत्येक व्यक्ति को उनके चार मुख दिखाई देते है!
४-किसी भी जीव की हिंसा नहीं होती!उनके शरीर सेकोई जीव स्पर्श कर जाए तो मरता नहीं है!५-उनके ऊपर कोई उपसर्ग नहीं कर सकता!उनके ऊपर कोई आपत्ति नहीं आ सकती ,उनकी १०० इंद्रा हमेशा सेवा मे रहते है!
६-वे ,कवलाहार नहीं करते,उन्हें भूख,प्यास लगनी सब बंद हो जाती है! तीर्थंकर भगवान् आदिनाथ ३००० फीट लम्बे थे ,संख्यों वर्षों तक केवली अवस्था में रहे, भगवन महावीर के लम्बाई १०.५ फीट ,३० वर्ष केवली रहे थे !उन्हें भूख ही नहीं लगती क्योकि हमारे आपके शरीर के सामान,केवलज्ञान के बाद उनके शरीर मे परम औदरिक होने के कारण कीड़ों का वास नहीं होता !इसलिए वे उनके शरीर से भोजन लेकर उसका हुन्नास depreciation नहीं करते!अत: उन्हें भोजन की आवश्यकता नहीं होती!
७-समस्त विद्याओं के स्वामी हो जाते है!
८- अब इनके नाखून और सिर के केश बढ़ना बंद कर देते है! गृहस्थ जीवन मे तीर्थंकर के बाल केवल इतने बढ़ते है की उन्हें किसी से कटवाना नहीं पड़ता !
९-उनकी पलकें नहीं झपकती क्योकि उनके अन्तरायकर्म का नाश हो जाता है जिससे उनकी शक्ति प्रगट हो जाती है,जिससे उनकी पलकों का झपकना बंद हो जाता है!हमारी पलके थकान के कारण झपकती है!
१०-उनके शरीर से करोडो सूर्य और चद्रमा की कान्ति के तुल्य प्रकाश निकलता है, जिससे उनकी परछाई नहीं पड़ती!
तीर्थंकर के केवल ज्ञान होते ही प्रथ्वी से ५००० धनुष ऊपर अर्थात ३० हजार फीट ऊपर उठ जाते है,इंद्र आकर उनके सम्वशरण की रचना करते है!
(3). १४ देवकृत अतिशय-अर्थात देवों के द्वारा की गयी विशेषताए-
१-अर्द्धमागधीभाषा का होना-देव भगवान् के उपदेश को समवशरण में इस प्रकार फैलाते है की वहां बैठे सभी प्राणी सामान स्पष्टता के साथ सुन सके!अर्थात १२ सभाओं में आगे-पीछे बैठा जीव भी भाषा को बराबर स्पष्टता से सुनता है!किसी भी जीव को कम अथवा डिस्टर्बेंस के साथ नहीं सुनायी पड़ता ! भगवान् की दिव्यध्वनि ॐकार रूप होती है!जैसे ॐ ॐ --!स्वभाव से प्रत्येक जीब,(तिर्यन्चों सहित), को समझ में आने वाली होती है! ७१८ भषाओं में होती है!
२- सब जीवों मे मित्रता-समवशरण में तिर्यन्चों मे गाय/शेर सभी आते है किन्तु उनमे रंचमात्र बैर नहीं होता!
३-आकाश देवों द्वारा सदा निर्मल रखा जाता है ऐसा नहीं कभी वर्षा हो गयी,आंधी आ गयी!
4-दिशाओं को निर्मल रखा जाता है
५- समस्त ऋतुओं के फल फूल वृक्षों मे एक साथ फलने के कारण,लग जाते है चाहे कोई भी ऋतू हो!
६-पृथ्वी कांच के सामान चमकदार -धुल,कंकड़ ,पत्थर रहित होती है!
७-कमलों की रचना-भगवान् के विहार करते समय भगवन के चरण के नीचे देव २२५ स्वर्ण कमलों की रचना करते है!
८-आकाश में देवतागण भगवान् की जय जयकार का नाद करते हुए चलते है!
९-मंद सुगन्धित ठंडी ठंडी सुहावनी पवन का बहना!
१०-सुगन्धित जल की हल्की हल्की बुँदे आकाश से गिरती रहती है!
११-भूमि पर कांटे,कंकड़ .पत्थर आदि हुछ नहीं रहते !
१२-आनंदमय होना -किसी को मारता नहीं,पिटाई नहीं करता !
१३-भगवान् के विहार के समय वृत्ताकार प्रकाशमान, सहस्र आड़े वाला धर्मचक्र चलता है!
१४-अष्ट मंगल द्रव्य होते है
इस प्रकार देवों द्वारा केवली भगवान् के १४ अतिशय किये जाते है!
(4). अरिहंत परमेष्ठी के अष्ट प्रातिहार्य-
१-अशोकवृक्ष-२-पुष्पवृष्टि होना,३-दुंदभी-देवताओं द्वारा नगाड़े बजाना,४-सिंहासन-मणियों का सिंहासन होना,५-दिव्यध्वनी,६-भामंडल,७-तीन छत्र,८-चौसठ चंवर!
(5). अरिहंत परमेष्ठी के अनंत चतुष्टय-
अनंत चतुष्टय-अनंत (ज्ञान,दर्शन,सुख,और वीर्य)चार चतुष्टय होते है!
अर्हन्त परमेष्ठी और तीर्थंकर में अंतर-जिनको केवलज्ञान होता है किन्तुकल्याणक नहीं होते वे सामान्य केवली/केवली होते है!जिनके कल्याणक होते है वे तीर्थंकर केवली होते है!भगवान् बाहुबली अरिहंतपरमेष्ठी थे महावीर भगवान् अरिहंतपरमेष्ठी में तीर्थंकर थे!तीर्थंकरों की १०० इंद्र वंदना करते रहते है!
ये ४६ अतिशय तीर्थंकर अर्हिंतों के होते है किन्तु सामान्य अर्हिंत के जन्मों के अतिशय तो होंगे नहीं और भी कुछ कम हो जाते है!
तीर्थंकर २,३,५ कल्याणक के भेद से तीन प्रकार के होते है!भरत और ऐरावत क्षेत्र मे तीर्थंकर पञ्च कल्याणक वाले और विदेह मे तीनों कल्याणक वाले होते है!
वर्तमान में विदेह क्षेत्र मे सीमंधर,युगमंदर आदि २० भगवान् विराजमान है और ये वहां सदा विराजमान रहेंगे!