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श्रावक के १४ नियम - Printable Version

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श्रावक के १४ नियम - scjain - 06-28-2015

श्रावक के १४ नियम जो हमें रोज़ लेने चाहिये ..... 
इन नियमो की धारणा करने से पालन करने से हम बहुत से अनचाहे कर्म बंधन से बच सकते हैं ।

जीवन को अनुशासित बनाने के लिए त्यागमयी वृतियो में दृढ़ता लाने के लिए प्रत्येक श्रावक को अपनी दिनचर्या को नियमबद्ध करने का विधान जैनागम में है ।
जगत की सभी वस्तुएं उसके उपयोग में नहीं आ सकती ।
अतः उन वस्तुओ के उपयोग का अनावश्यक पाप बंध न हो इसके लिए चोदह नियम लेने चाहिए ।
इसमें आवश्यक चीजें खुली भी रख सकते हैं और अनावश्यक के त्याग का भी लाभ भी हो जाता है

खाते पीते भी पापो से बचने का सुन्दर व् सरल उपाय है , यह चोदह नियम इस प्रकार है : -
सचित दव्व विगई वाणह तंबोल वत्थ कुसुमेशु ।
वाहण शयन विलेपन बंभ दिसि ण्हाण भत्तेसु ।।
१. सचित्त :- सचित्त अर्थात जिस जीव में सत्ता है ।
इसमें सचित पदार्थो के सेवन की दैनिक मर्यादा रखी जाती है।
सचित्त पदार्थ वे है . जैसे कच्ची हरी सब्जी , फल , नमक , पानी आदि का सम्पूर्ण त्याग अथवा इतनी संख्या से अधिक उपयोग नही करूँगा ऐसा नियम करना ।

२ . द्रव्य :- द्रव्य की प्रतिदिन मर्यादा रखनी है , इसमें पदार्थो की संख्या का निश्चय किया जाता है ।
भिन्न भिन्न नाम व स्वाद वाली वस्तुएं इतनी संख्या से अधिक खाने के काम में नहीं लूँगा ।
जैसे खिचड़ी , रोटी आदि का नियम करना ।

३ . विगई :- अभक्ष्य विगई , मदिरा , मांस , शहद और मक्खन इनका सर्वथा त्याग होना ही चाहिए ।
भक्ष्य विगई : - प्रतिदिन तेल घी दूध दही शक्कर / गुड तथा घी या तेल में तली हुयी वस्तु ये छः विगई है ।
इनका यथाशक्ति त्याग करना या रोज कम से कम 1 विगई त्याग करना ।
४. वाणह :- जूता मोजा चप्पल आदि पाँव में पहनने की चीजो की मर्यादा रखें ।
५.तम्बोल :- मुखवास के योग्य पदार्थों , पान सुपारी आदि का त्याग करना या दैनिक के लिए परिमाण रखना
६. वत्थ :- पहनने ओढ़ने के वस्त्रों की दैनिक मर्यादा रखना।
आज में ..... संख्या में वस्त्रों को अपने शरीर पर धारण करूँगा , इससे अधिक वस्त्रों को नहीं पहनूंगा ।

७. कुसुम :- पुष्प तेल इत्र क्रीम पाउडर आदि सुगंधित पदार्थों का दैनिक मर्यादा रखना
८. वाहन :- रिक्शा स्कूटर कर बस ट्रेन आदि का दैनिक उपयोग या मर्यादा करें
९. शयन :- शय्या आसन कुर्सी बिछोना पलंग आदि का प्रमाण करना
१०. विलेपन :- साबुन तेल पाउडर आदि का प्रमाण करें
११. ब्रह्मचर्य :- परस्त्री का सर्वथा त्याग , स्वस्त्री के साथ मर्यादा का संकल्प करें ।
१२. दिशा :- दश दिशाओ में अथवा एक दिशा में इतने कि. मी. से अधिक दूर जाने की सीमा निश्चित करना ।
१३. स्नान :- श्रावक प्रतिदिन स्नान हाथ पैर धोने की संख्या की मर्यादा रखना ।
१४.भत्त नियम :- प्रतिदिन अन्न पानी आदि चारो आहारों का तोल रखना ।
इन १४ नियमों को धरणेवाले प्रातः काल सूर्योदय और सांयकाल के समय शुद्ध भूमि पर बैठकर ३ नवकार गिनकर निम्नलिखित पच्चखान लें ।
देसावगासियं भोगपरिभोमं पच्चखामि अन्नथनाभोगेनं सहसागारेणं महत्तरागारेनं सव्व्समाहि वत्तियागारेणम् वोसिरामी ।
इन १४ नियम के अतिरिक्त अन्य भी कुछ नियम है जो उपयोगी होने से उनका पालन करना जरुरी है ।
१. पृथ्वीकाय :- मिट्टी नमक पत्थर आदि जो खाने व किसी काम के उपयोग में आवे उनका प्रमाण करना
२. अपकाय :- जो पानी स्नान करने धोने नहाने व पिने के काम में आवे उसका प्रमाण करना ।
३. तेउकाय :- चूल्हा भठी चिराग गैस बिजली स्वीच आदि का प्रमाण करना ।
४. वायुकाय :- झुला पंखा कूलर ऐ.सी. आदि की मर्यादा रखना ।
५. वनस्पतिकाय:-हरी वनस्पति का प्रमाण करना ।
६. त्रसकाय :- निरपराधी चलते फिरते जीवो को न मारने का नियम रखना , अनजाने में मर जाये तो मिच्छामी दुक्क्डम देना
आज तक हमने बहुत कर्म बंधन कर लिए 
आज से हम १४ नियम आदि का पालन करके अनंत जीवों को अभयदान दे सकते हैं ।

जब जागो तब सवेरा
अभी इसी वक्त से श्रावक के १४ नियम लेने का संकल्प लेकर कर् निर्जरा की ओर अपना एक और कदम उठायें