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श्रावक के व्रत और प्रतिमाये भाग १ - Printable Version

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श्रावक के व्रत और प्रतिमाये भाग १ - scjain - 02-08-2017

साधारण गृहस्थ को व्रती गृहस्थ बन्ने के लिए आवश्यक व्रत-
बुरे एवं पांचों पापो का त्याग कर ,अच्छे कार्य करने का नियम लेना, व्रत है!
व्रतों के भेद-
१- अणुव्रत-गृहस्थ,पाचों पापो का त्याग पूर्णतया नहीं करता,आंशिक रूप से मोटा -मोटी ,से एक   देश त्याग करताहै ,ये अणुव्रत कहलाते है!
२-महाव्रत -मुनि महाराज पाँचों पापों का पूर्णतया,सर्वदेश  त्याग करते ,ये महा व्रत कहलाते है!
सामान्य जैनी श्रावक नहीं होते है,वे १२ व्रतों को धारण कर ही श्रावक होते है! श्रावकों को ५ अनुव्रत,३ गुण व्रत और ४शिक्षा व्रत कुल  १२ व्रत लेने होते है !
५ अणुव्रत-छोटे व्रतों को  अणुव्रत कहलाते है!
भेद- हिंसा,झूठ,चोरी,कुशील,अधिक  परिग्रह(परिग्रह को सीमित कर लिया) का -त्याग यदि स्थूल रूप से कियाजाता है तो क्रमश: अहिंसा,सत्य,अचौर्य ,ब्रह्मचर्य,अपरिग्रह अणुव्रत होता है!
अहिंसा अणुव्रत - जीव स्थावर और त्रस,दो प्रकार के होते है!अणुव्रत में त्रस जीवों की हिंसा का त्याग किया जाता हैक्योकि स्थावर जीवों की हिंसा का त्याग  गृहस्थ के लिए असंभव है फिर भी, गृहस्थों को भी, स्थावर जीवों की जहाँतक हो सके हिंसा से बचना चाहिए!
2- सत्याणुव्रत-सत्याणुव्रती -स्थूल रूप सी  झूठ का त्यागी होता है,क्रोध नहीं करता क्योकि क्रोध मे झूठ बहुत बोलजाता है,वह लोभी नहीं होता इसलिए माल मे मिलावट नहीं करता,डरता नहीं किसी से क्योकि भय के कारण भीझूठ बहुत बोल जाता है,वह थोड़े अच्छे ,मधुर,प्रिय शास्त्रों के अनुसार  वचन बोलता  ३-अचौर्य अणु व्रत - अचौर्य अणु व्रती स्थूल रूप से चोरी का त्याग करता है!किसी की गिरी हुई कोई वस्तु,पडी या राखी वस्तु को नहीं उठाएगा!किसी को उठाकर भी नहीं देगा!वो विज्ञापन द्वारा उस वास्तु को उसके मालिक के पास पहुंचाने का प्रयास करेगा!किसी को चोरी करने के लिए प्रेरित नहीं करेगा,किसी से चोरी का माल नहीं खरीदेगा,किसी के द्वारा चोरी करने पर उसकी प्रशंसा नहीं करेगा,किसी वास्तु मे कुछ मिलकर बेचेगा नहीं!सरकारी विभागों के करों की चोरी नहीं करेगा!टोल मे कम ज्यादा नहीं तोलेगा!अचौर्य अणु व्रती  ये सब कार्य नहीं करते!
४-ब्रह्मचर्य अणु व्रती -इस व्रत का धरी श्रावक/श्राविका अपनी पत्नी/पति मे संतुष्ट रहता है!अन्यों मे माता,बहिनों/पिता भाइयों का भाव रखता है!किसी की ऒर बुरी दृष्टि नहीं रखते!वह अष्टमी और चतुर्दशी को संयम से रहते है!बदचलन औरतों/मर्दों के पास नहीं जाते!गरिष्ट-उत्तेजक भोजन का सेवन नहीं करते! क्योकि इससे इन्द्रिय संयमित नहीं रह पाती!वह किसी भी स्त्री-लडकी/पुरुष-लडके से एकांत मे बात नहीं करते!ब्रह्मचर्य अणुव्रती टीवी और सनीमा उत्तेजक द्रश्यो के देखने से बचने के लिए नहीं देखता! कदाचित धार्मिक कार्यक्रमो जैसे पञ्च कल्याणक, पाठशाला आदि को देखते है! अपने परिणामों को वह बहुत संयमित रखता है जिससे काम वासन जागृत नहीं हो!
५-परिग्रह अणु व्रत -यदि श्रावक सर्वथा परिग्रह छोड़ देगा तो मुनि ही बन जाएगा!इसलिए वह अपने लिए आवश्यक परिग्रह रखता है,पूर्णतया परिग्रहों को छोड़ता नहीं है!जैसे अपने खेत ,मकान,जेवर,कपडा,जायदाद,कार,रूपये पैसे रखने की सीमा निर्धारित कर नियम ले लेता  है!इससे अधिक परिग्रह संकल्प पूर्वक नहीं रखता !यह परिग्रह परिमाण अणुव्रत होता है!
गुणव्रत-
गुणव्रत, -५ अणुव्रतों की विशुद्धि बढाकर गुणवान करके उनमे विशिष्टता प्रदान करते है!
गुणव्रत के भेद-
१-दिगव्रत-दिगव्रती जीव संतोषी,समयाग्द्रिष्टि,और पापों मे कम प्रवृत्ति रखने वाला होता है! ये दसों दिशाओं; उत्तर-दक्षिण,पूर्व -पश्चिम ,चार कोने की विदिशाओं ,और ऊपर-नीचे,में अपने गमन की सीमा जीवन पर्यन्त के लिए सीमित कर लेते है२-देशव्रत- देशव्रत में श्रावक,अपने दिग्व्रत मे ली गयी सीमा को अल्प समय के लिए और संकुचित करता है!जैसे यदि उसने दिग्व्रत में उत्तर प्रदेश के सीमा का नियम लिया है तो इस व्रत में वह नियम लेता है की,दसलक्षण पर्व,में अपने शहर/ग्राम/कोलनी से बहार नहीं जायेगा!इससे उसकी गतिविधियाँ और संकुचित क्षेत्र मे रह जायेगी फलत: उससे पाप कार्य और कम होंगे!दिग्व्रत जीवन पर्यन्त लिया जाता है! देशव्रत १,२,---२४ घंटे,२-३---१४ दिन .१ पक्ष ,१-२-३ माह,११ माह,वर्ष आदि, किसी समय के लिए लिया जाता है!
३-अनर्थदंडव्रत -
अनर्थदंड अर्थात निष्प्रयोजन,किसी कार्य से कोई लाभ तो नहीं है,किन्तु उससे दंड -पाप हो ही जाए! व्रत-इस प्रकार के कार्यों को छोड़ना !
अर्थात निष्प्रयोजन कार्यों का त्याग करना,अनर्थ दंड व्रत है!
उनके सोते,जागते,बैठते ,प्रति समय निर्जरा होती ही है! इसलिए इन व्रतों को धारण करने से लाभ ही लाभ है
शिक्षा- अणुव्रतों की विशुद्धि के लिए,हमें अपनी भाग दौड़,आने-जाने की गमन की सीमाओं को निर्धारित करना है,फिर अल्प समय के लिए उनकी सीमाओं को  देशव्रत धारण कर और संकुचित करना है,कोई निष्प्रयोजन कार्य नहीं करने है,जिससे पाप-बंध से बच सके!
शिक्षाव्रत-
जो व्रत श्रावक को मुनि बनने की शिक्षा देते है, और वह दृढ़ता के साथ क्षुल्लक,ऐल्लक बनने की ऒर अग्रसर होते हुए अपनी पर्याय को सफल कर लेते है वे शिक्षा व्रत है!
शिक्षाव्रत भेद-१-सामायिक शिक्षाव्रत-२- प्रोषधोपवास शिक्षाव्रत-३-भोगोपभोग परिमाण शिक्षाव्रत -४- अतिथिसंविभाग शिक्षाव्रत-
१-सामायिक शिक्षाव्रत-इस व्रती को प्रात:,अपरान्ह.और सायं प्रत्येक काल में,२ घड़ी =४८ मिनट, के लिए सामयिकी करनी होती है!
२-प्रोषधोपवास शिक्षाव्रत-
प्रोषधोपवास= प्रोषध-एक बार भोजन करना , उपवास-पूर्ण उपवास रखना !प्रोषधोपवास व्रत उत्तम ,माध्यम और जघन्य से 3  प्रकार का होता है!
उत्तम प्रोषधोपवास में,सप्तमी के दिन व्रती एकासन,अष्टमी को उपवास और नवमी को एकासन करता है! शक्ति हीनता के कारण यह न कर सके तो
मध्यमप्रोषधोपवास -अष्टमी/चतुर्दशी को उपवास कर सकते है !यदि यह भी नहीं किया जा सकता तो
जघन्य प्रोषधोपवास - अष्टमी/चौदश को एकासन किया जा सकता है!
इसमें व्रती को कोई सांसारिक कार्य जैसे व्यापार,नौकरी,घर गृहस्थी के कार्यों का निषेध है!किन्तु मजबूरी हो तो बात दूसरी है!
शास्त्रों के अनुसार तो सप्तमी/तेरस के दिन व्रती को एक समय भोजन लेकर १२ बजे मंदिर जी/धर्मशाला में उपवास के लिए चला जाना चाहिए,अष्टमी/चतुर्दशी को पूर्ण उपवास ,नवमी/अमावस्या-पूर्णिमा को १२ बजे घर जाकर भोजन लेना चाहिए!जब तक मंदिर/धर्मशाला में रहे ,धर्म ध्यान में लगे रहना चाहिए! व्रत के दिनों में श्रंगार,सेंट आदि का निषेध है!शरीर से निर्लिप्त होकर व्रती को मात्र स्व आत्म चिंतन करना है!
३-भोगोपभोग परिमाण शिक्षाव्रत -
भोग- जो वस्तु एक बार भोगने में आती है,जैसे दाल,रोटी,सब्जी,चावल,फल आदि उसे भोग कहते है!
उपभोग-जो वस्तु बार २ भोगने में आती है जैसे वस्त्र,चार,मकान आदि उपभोग कहलाते है!
जो भोग और उपभोग की सामग्री की सीमा हमने अपने परिमाण परिग्रह व्रत में रखी है उसे भी उस दिन व्रत के लिए संकुचित कर लेते है!
उत्तम पात्र-मुनि ,
माध्यम पात्र-व्रती महिला और पुरुष ,ऐल्लक,क्षुल्लक,आर्यिका माता जी
जघन्यपात्र-साध्वी जैनी भाई!
यदि कभी व्रती को पात्र नहीं मिले आहार दान के लिए तब वह अपना व्रत निभाने के लिए भावना भायेगा अपने भोजन से पूर्व की "मै  हाथ जोड़कर,भावना भाता हूँ की पूरे मनुष्य लोक में जितने भी मुनि,आर्यिका माताजी,ऐल्लक, श्रावक,श्राविका जी का निरन्तराय आहार हो!"  ये भावना भाने के बाद वह स्वयं भोजन ग्रहण करता है!
यह अतिथि संविभाग शिक्षा व्रत है! इसको आहार दान भी कह सकते है!
३- आपकी माँ या पत्नी आपको आलू बना कर नहीं देंगी इसलिए आपने उनकी अनुपस्थिति में बनाकर उनका सेवन कर लिया,सेवन करने के बाद आपको पश्चाताप हुआ की ओह मेरा तो व्रत भंग हो गया ,यह हुआ तीसरा दोष !
४ -आपने आलू खा भी लिया और कोई प्रायश्चित नहीं हुआ,अर्थात नियम के टूटने की भी परवाह नहीं करी,यह चौथा दोष हो गया!
ये है व्रत भंग! व्रती सुबह,शाम प्रतिक्रमण करते है जिससे उनके व्रतों में दोष नहीं लगे!