तत्वार्थ सूत्र अध्याय ९ भाग ३
#1

आभ्यन्तर तपों के उत्तर भेद-
नव-चतुर्दश पञ्च द्विभेदा यथाक्रमं प्रागध्यानात् !!२१!!
संधि विच्छेद-नव+चतु:+दश +पञ्च+द्वि+भेदा+यथाक्रमं+प्रागध्यानात् 
शब्दार्थ-९,४ १० ,५,२  भेद-भेद,यथाक्रमं -क्रमश, प्राग्- पहिले ,ध्यानात् -ध्यान से 
अर्थ-ध्यान तप से पहिले क्रमश: प्रायश्चित तप के ९,विनय तप के चार,वैय्यावृत्य के १०,स्वाध्याय के ५ और व्युत्सर्ग तप के २ भेद है !
प्रायश्चित तप के भेद -
आलोचनाप्रतिक्रमणतदुभयविवेकव्युत्सर्गतपश्छेदपरिहारोपस्थापना: !!२२!!सन्धिविच्छेद-
आलोचना+प्रतिक्रमण +तदुभय +विवेक+ व्युत्सर्ग +तप:+छेद+परिहार+उपस्थापना: 

शब्दार्थ-
आलोचना+प्रतिक्रमण +तदुभय +विवेक+ व्युत्सर्ग +तप:+छेद+परिहार+उपस्थापना: 
अर्थ-आलोचना,प्रतिक्रमण,तदुभय (आलोचना और प्रतिक्रमण दोनों का),विवेक,व्युत्सर्ग , तप:,छेद,परिहार,उपस्थापना  प्रायश्चित तप के भेद है !
भावार्थ-प्रायश्चित तप के निम्न ९ भेद है !
१-आलोचना-गुरु के समक्ष ,दस दोषों रहित  अपने प्रमाद के लिए प्रायश्चित का  निवेदन करना , आलोचना, प्रायश्चित तप है !
दस दोष-
१- अकम्पित दोष-आचार्य को पिच्छी कमण्डलु इस भाव से भेट करना की वे दया कर कम से कम प्रायश्चित दे !
२-अनुमापित  दोष-गुरु से बातचीत कर प्रायश्चित का अनुमान लगाकर दोष के लिए प्रायश्चित का निवेदन करना !
३-दृष्ट दोष- किसी के  दोष देख ने पर ही  प्रायश्चित का निवेदन करना किन्तु  किसी के नही देखने पर प्रायश्चित का निवेदन नहीं करना !
४-बादर दोष-केवल स्थूल दोषों के लिए ही प्राश्चित के लिए  निवेदन करना !
५-सूक्ष्म दोष-महान  प्रायश्चित  के भय से  महान दोषों को छुपकर सूक्ष्म दोषों के लिए प्रायश्चित अ निवेदन करना !
६-छन दोष-महाराज  से दोष का प्रायश्चित जानने के बाद ,उनसे दोष के  प्रायश्चित के लिए निवेदन करना!
७- शब्दा कुलित दोष-प्रतिक्रमण के दिन जब बहुत साधु आये हो ,खूब शोर हो रहा हो रहा हो ,उस समय दोष का निवेदन कर प्रायश्चित मानना जिससे कोई सुन नहीं सके !
प्रतिक्रमण,तदुभय (आलोचना और प्रतिक्रमण दोनों का),विवेक,व्युत्सर्ग , तप:,छेद,परिहार,उपस्थापना 
८ -बहुजन दोष-अपने गुरु /आचर्य द्वार दिए गए प्रायश्चित को शंकित होकर अन्य साधुओं से पूछना कि२ प्रायश्चित ठीक दिया दिया या नही !
९ अव्यक्त!  दोष-सपने गुरु के समअपने दोष पर क्ष अपना दोष नहीं कह कर अन्य साधुओं से  कहना!
१०-तत्सेवी दोष-गुरु से प्रमाद का निवेदन नहीं कर के,जिस साधु ने अपने समान अपराध किया ,उससे पूछना की तुम्हे गुरु ने क्या प्रायश्चित दिया था क्योकि तुम्हारे समान ही मेरा अपराध है !


२-प्रतिक्रमण-प्रमाद से जो दोष मुझ से हुआ  वह  मिथ्या हो!
इस प्रकार अपने दोष पर पश्चाताप कर गुटु से निवेदन करना ,प्रतिक्रमण प्रायश्चित तप है !
३-तदुभय (आलोचना और प्रतिक्रमण दोनों का)-कोई दोष/अपराध केवल आलोचना अथवा प्रतिक्रमण से दूर हो  जाता है और कोई इन दोनों से होता है ,वही तदुभय प्रायश्चित है !
४-विवेक-सदोष आहार और  उपकरणों का नियमित समय पर त्यागना विवेक प्रायःचित तप है !
५-व्युत्सर्ग-कुछ समय के लिए कायोत्सर्ग करना व्युत्सर्ग प्रायश्चित तप है
६- तप-उपवासादि करना तप प्रायश्चित है !
७ छेद-दीक्षा को कुछ वर्षों के लिए छेदित कर, दीक्षा पुन : छेदित काल के अनुसार ,लेना  छेदित दीक्षा है! इसमें दीक्षा की प्राचीन वरिष्टता समाप्प्त होकर जितने समय का दीक्षा छेदन किया है ,वहां से  दीक्षा काल माना जार्ता है !
८-परिहारप्रायश्चित-कुछ समय के लिए संघ से पृथक करना परिहार प्रायश्चित तप है
९-उपस्थापना- पुराणी सम्पूर्ण दीक्षा छेद कर नवीन तरह से दीक्षा देना उपस्थापना प्रायश्चित तप है !
विशेष-प्रायश्चित =प्राय:+चित्त ,प्राय: का अर्थ अपराध और चित्त का अर्थ शुद्धि है अर्थात प्रायश्चित का अर्थ  शोधन करना है !
 विनय तप के भेद-
ज्ञानदर्शनचारित्रोपचारा: !!२३!!

उक्त सूत्र तत्वार्थ सूत्र जी , उमास्वामी जी द्वारा विरचित पूजीपपाद स्वामी की टीका सर्वार्थ सिद्धी के अध्याय ९ "संवर एवं निर्जरा "का २३वा सूत्र है !
इस सूत्र मे आचर्यश्री अंतरंग ६ तपों में दुसरे   विनय तप के भेदो को उपदेशित कर रहे है  सन्धिविच्छेद -ज्ञान+ दर्शन +चारित्र+उपचारा:
शब्दार्थ -ज्ञानविनय, दर्शनविनय ,चारित्रविनय और उपचार विनय ,विनय तप के चार भेद है !
अर्थ-ज्ञान विनय,दर्शन विनय,चारित्र विनय और तपस्वियों की विनय ,विनय तप के चार भेद है !
भावार्थ-
१-ज्ञान विनय तप -
,यथायोग्य काल में  अत्यंत आदर पूर्वक, आलस्य त्याग कर ,मोक्ष के लिए सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति हेतु शास्त्रों के स्वाध्याय का अभ्यास और  स्मरण करना,ज्ञान विनयतप  है

२-दर्शन विनय तप -शंकादि २५ दोषो से रहित सम्यग्दर्शन के आठ अंगों सहित, तत्वार्थ का श्रद्धान करना ;दर्शन विनय तप है !
 ३-चारित्र विनय तप -सम्यग्दृष्टि के १३ भेद सहित चारित्र का निर्दोष धारण करना ,चारित्र विनय तप है  और
 ४-उपचार विनयतप -आचार्यों और पूज्य पुरुषों के आने पर आदरपूर्वक  खड़े होना ,उनके पीछे चलना,नमोस्तु ,उनके गुणों का स्मरण करना आदि  उपचार विनयतप  है 

सर्वार्थसिद्धि  (पूज्यपाद जी) जी -अनुसार -
ज्ञानदर्शनचारित्रोपचारा: !!२३!
864 विनय' -इत्यधिकारेणाभिसंबन्धः क्रियते।ज्ञानविनयो दर्शनविनयश्चारित्रविनयः उपचारविनयश्चेति।सबहुमानं मोक्षार्थज्ञानग्रहणाभ्या सस्मरणादिदर्शन विनयः। शंकादिदोषविरहितं तत्वार्थश्रद्धानं दर्शनविनयः ।तद्वतश्चारित्रे समाहितचितता चारित्रविनयः।प्रत्यक्षेष्वाचार्यादििष्वभ्युथानाभिगमनाञ्जलिकरणादिरूपचारविनयः।परोक्षेष्वपि कायवाड्॰मनोऽभिरंजलिक्रियागुणसंकीर्तनानुस्मरणादिः


वैय्याव्रत्य  तप केभेद -
आचार्योपाध्याय तपस्वी शैक्ष्य ग्लान गण कुल संघ साधु मनोज्ञानाम् !!२४!!
सन्धिविच्छेद-आचार्य+उपाध्याय+तपस्वी+शैक्ष्य+ग्लान+गण+कुल+संघ+साधु+मनोज्ञानाम्
शब्दार्थ-आचार्य+उपाध्याय+तपस्वी+शैक्ष्य+ग्लान+गण+कुल+संघ+साधु+मनोज्ञानाम्
अर्थ-आचार्यवैय्यावृत्य,उपाध्यायवैय्यावृत्य,तपस्वीवैय्यावृत्य,शैक्ष्यवैय्यावृत्य,ग्लानवैय्यावृत्य,गणवैय्यावृत्य,कुलवैय्यावृत्य,संघवैय्यावृत्य,साधुवैय्यावृत्य और मनोज्ञ वैय्यावृत्य,वैय्यावृत्य तप  के १० भेद है !
भावार्थ- वैय्याव्रत्य तप  १०-=भेद है -
१-आचार्यवैय्यावृत्य- जो  पंचाचार का स्वयं पालन करते हुए संघ के अन्य मुनियों  करवाते है,आचार्य है !
२-उपाध्यायवैय्यावृत्य-मोक्ष के लिए जिन मुनि के पास जाकर शास्त्रों को अभ्यास करते है  वे उपाध्याय  है !
३-तपस्वीवैय्यावृत्य-महोपवास आदि का अनुष्ठान करने वाले तपस्वी है
४-शैक्ष्यवैय्यावृत्य-शिक्षा लेने वाले साधु शैक्ष्य है !
५-ग्लानवैय्यावृत्य-रोग से ग्रस्त साधु ग्लान कहलाते है !
६-गणवैय्यावृत्य-वृद्ध मुनियों के अनुसार चलने वाले साधु गण है !
७-कुलवैय्यावृत्य-एक ही आचार्य द्वारा दीक्षित शिष्य कुल है !
८-संघवैय्यावृत्य-ऋषि,यति,मुनि,अंगार इन चार प्रकार के मुनियों का समूह संघ है 
९-साधुवैय्यावृत्य-से दीक्षित मुनि साधु है 
 और
०-मनोज्ञ वैय्यावृत्य-लोक में ख्याति प्राप्त साधु है !
उक्त दस प्रकार के  साधु की वैयावृत्य तप के १० भेद साधुओं के भेद की अपेक्षा है !
 
स्वाध्याय तप के भेद-
वाचनाप्रच्छनानुप्रेक्षाम्नायधर्मोपदेशा:!!२५!!

सन्धिविच्छेद-वाचना+प्रच्छना+अनुप्रेक्षा+आम्नाय+धर्मोपदेशा: 

शब्दार्थ-वाचना-वाचन करना, प्रच्छना-प्रश्नो पूछने,अनुप्रेक्षा-स्वधाय का पुन :चिंतवन करना,आम्नाय-सूत्रों/ गाथाओं का  शुद्धता से पाठन करना,धर्मोपदेशा:- स्वाध्याय द्वारा योग्यता प्राप्त करने के बाद धर्मोपदेश देना 
अर्थ-स्वाध्याय तप के वाचना ,प्रच्छना,अनुप्रेक्षा,आम्नाये  धर्मोपदेश ,५ भेद है !
भावार्थ-स्वाध्यात्य तप के निम्न पांच भेद है !
१-वाचना-निर्दोष धर्म ग्रंथों को इच्छुक विनयशील पात्रों को देना/ उनका अर्थ बताना/या दोनों करना वाचना स्वाध्याय तप है
२-प्रच्छना-संशय के दूर करने के उदेश्य से अथवा कृत निर्णय की दृढ़ता करने के लिए विशिष्ट ज्ञानियों से प्रश्न करना ,प्रच्छना स्वाध्याय तप है !
३-अनुप्रेक्षा-स्वाध्याय द्वारा जाने गए पदार्थों का मन ही मन बार बार चिंतवन करना,अनुप्रेक्षा स्वाध्याय तप है
४-आम्नाये-शुद्धता पूर्वक शब्दों का  उच्चारण करते हुए पाठन करना ,आम्नाये स्वाध्याय तप है !
 तथा
५-धर्मोपदेश -जीवों के कल्याण की भावना से धर्मोपदेश देना। धर्मोपदेश स्वाध्याय तप  है !
विशेष-स्वाध्याय से ज्ञान ,वैराग्य भावना की अभिवृद्धि होती है और वह व्रतों का निर्दोष अतिचार रहित  पालन में सहायक होता है!मन की स्थिरता के लिए स्वाध्याय से बढ़कर अन्य उपाय नहीं है क्योकि इससे आप सही शास्त्र जी का स्वाध्याय करने से ,वस्तु स्थिति की वास्तविकता को ज्ञात करते है और जो शास्त्रों में फर्जी वाड़ा  चल  बचते हुए जिनवाणी के असली मर्म को जान पाते है !
व्युसर्ग तप के भेद -

बाह्याभ्यन्तरोपध्यो: !!२६!!

संधि विच्छेद-बाह्य+अभ्यन्तर+उपध्यो:
शब्दार्थ- बाह्य-बाह्य,अभ्यन्तर-अभ्यंतर,उपध्यो:-उपधि -त्याग 
अर्थ-व्युत्सर्ग का अर्थ त्याग है !इसके बाह्य उपधि(त्याग) और अभ्यंतर उपधि(त्याग) दो भेद है !
बाह्य उपधि (त्याग )व्युत्सर्ग तप-धन ,सम्पत्ति आदि का त्याग करना बाह्य त्याग व्युत्सर्ग तप है !
अभ्यंतर त्याग व्युत्सर्ग तप -क्रोध मान माया लोभ अभ्यंतर कषायों का त्याग करना अभ्यंतर त्याग व्युत्सर्ग तप है !कुछ समय  के लिए अथवा जीवन पर्यन्त ममत्व/काय का त्याग करना अभ्यंतर उपधि (त्याग) व्युत्सर्ग तप है !इसके करने से जीव के जीवन की  तृष्णा नहीं रहती,वह निर्भय होकर  हल्का हो जाता है !
शंका-पञ्च महाव्रतों में परिग्रह का त्याग,दस धर्मों में त्याग धर्म,और नौ प्रायश्चितों में व्युत्सर्ग प्रायश्चित का उपदेश दिया है फिर व्युत्सर्ग तप अलग से क्यों कहा है?इसमें एक ही तत्व का पुन;पुन:कहने से पुनरोक्त दोष लगता है !
समाधान-पञ्च महाव्रतों में,परिग्रहत्याग महाव्रत में गृहस्थ संबंधी उपधि-त्याग की त्याग धर्म में आहार आदि विषयक आसक्ति कम करने की,व्युत्सर्ग प्रायश्चित में परिग्रह धर्म में लगने वाले दोषों के परिमार्जन की और व्युत्सर्ग तप में आत्मा से जुदा धन/धान्य बाह्य व मनोविकार तथा शरीर आदि के अभ्यंतरउपधि में आसक्ति के त्याग की प्रधानता है!अत:पुनरोक्त दोष नहीं आता !
ध्यान तप के लक्षण -
उत्तमसंहननस्यैकाग्र चिन्ता निरोधो ध्यानमान्तर्मुहूर्तात् !!२७!!
संधि विच्छेद-उत्तम+संहननस्य+एकाग्र+चिन्ता+निरोध:+ ध्यानम्+अन्तर्मुहूर्तात् 

शब्दार्थ-उत्तम-उत्तम,संहननस्य-सहनन वाले का ,एकाग्र-एकाग्रता से,चिन्ताचिंता को ,निरोध:-रोकना ,ध्यानम्-ध्यान है,अन्तर्मुहूर्तात् -अन्तर्मुहूर्त पर्यन्त 
अर्थ-उत्तम सहनन से युक्त जीव का अन्तर्मुहूर्त पर्यन्त +चिंता को रोकना ध्यान है !
भावार्थ-उत्तम सहनन, से युक्त मनुष्यों द्वारा अपने चित्त की वृत्ति को,समस्त विकल्पों से  हटाकर किसी एक विषय पर अधिकत्तम एक अन्तर्मुर्हूत एकाग्रतापूर्वक लगाना, ध्यान है 
विशेष-

१-ध्यान -अपने चित्त को समस्त विकल्पों से हटाकर एक ही विषय/पदार्थ  पर एकाग्रचित करना,ध्यान है
२-ध्याता -ध्यान; तीन उत्तम सहनन;वज्रऋषभनाराचसहनन,वज्रनाराचसहनन और नाराचसहनन में से किसी एक से युक्त मनुष्य ही ध्यान लगा सकते  है !ध्यान लगाने वाला  ध्याता कहलाता है 
३-उत्तम सहनन से युक्त मनुष्य के ध्यान अन्तर्मुर्हूत से अधिक समय नहीं लग सकता !
४- तीन में से किसी एक उत्तम सहनन से युक्त मनुष्य ध्यान तो लगा सकता है किन्तु मोक्ष के लिए वज्रऋषभनाराच  आवश्यक है !
शंका- ध्यान अधिकतम  अन्तर्मुर्हूत समय तक लग सकता है फिर भगवान ऋषभदेव ने  ६ माह तक ध्यान कैसे लगाया ?
समाधान -ध्यान की संतान को भी ध्यान कहते है!एक विषय पर ध्यान, अधिकतम अन्तर्मुर्हूत समय तक ही हो  सकता है किन्तु उसके बाद ध्येय(ध्यान का विषय) बदल जाता है और ध्यान की संतान चलती है ! 
जब विचार का विषय,एक पदार्थ नहीं होकर,नाना प्रकार के पदार्थ होते है तब वह विचार 'ज्ञान' कहलाता है !जब वह ज्ञान एक विषय में स्थिर हो जाता है तब वह 'ध्यान' कहलाता है !उस ध्यान का काल अन्तर्मुहूर्त है!
 ध्यान के भेद -
आर्त्तरौद्रधर्म्यशुक्लानि !!२८!!
संधि विच्छेद-आर्त्त+रौद्र+धर्म:+शुक्लानि 

शब्दार्थ-आर्त्त+रौद्र+धर्म्य+शुक्लानि 
अर्थ-ध्यान के आर्त्त,रौद्र,धर्म  और शुक्ल ध्यान चार भेद है !
भावार्थ-आर्त्त और रौद्र ध्यान अशुभ,संसार के कारण  है, त्याज्य है ,धर्मध्यान और शुक्ल ध्यान शुभ है !वर्तमान  में शुभ ध्यान में सिर्फ धर्म ध्यान सम्भव्  है,शुक्लध्यान सहनन  के अभाव  में असंभव है !अशुभ ध्यानों से हमें सर्वथा बचना चाहिए क्योकि ये दोनों अधोगति के आस्रव/ बंध के कारण है 

धर्मध्यान और शुक्ल ध्यान का फल -
परे मोक्षहेतू !!२९!!

संधि विच्छेद -परे +मोक्ष+हेतू
शब्दार्थ -परे-अंत के,मोक्ष-मोक्ष के,हेतू-हेतू है 
अर्थ-उक्त सूत्र में बाद के अर्थात धर्म और शुक्ल ध्यान मोक्ष के कारण है !
भावार्थ-धर्म ध्यान परम्परा से और शुक्ल  साक्षात मोक्क्ष का कारण है !

अनिष्ट संयोगज आर्त्त ध्यान का लक्षण  - आर्तममनोज्ञस्यसंप्रयोगेतद्विप्रयोगायस्मृतिसमन्वाहार:!!३०!!
संधि विच्छेद-आर्तम+अमनोज्ञस्य +संप्रयोगे +तद्विप्रयोगाय+ स्मृति+ समन्वाहार:!!
शब्दार्थ-आर्तम्-आर्त्त ध्यान है,अमनोज्ञस्य -अप्रिय वस्तु ;विष,काँटा,शत्रु आदि के,संप्रयोगे-समागम से,तद्विप्रयोगाय-उनसे पीच्छा छुड़ाने के लिए, स्मृति-स्मृति करते हुए उनके वियोग पर , समन्वाहार:-विचार करना मेरे यह कैसे न हो,!!
अर्थ-अप्रिय वस्तुओं जैसे विष,शत्रु,कांटे आदि के संयोग होने पर निरंतर चिंतवन करना की इनसे पीच्छा कैसे छुड़ाया जाए ,अनिष्ट संयोजक नामक आर्त्तध्यान है!
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तत्वार्थ सूत्र अध्याय ९ भाग ३ - by scjain - 04-26-2016, 12:06 PM
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