श्री जिन सहस्त्रनाम मन्त्रावली षष्ठम अध्याय भाग १
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श्री जिन सहस्त्रनाम मन्त्रावली षष्ठम अध्याय भाग १


५०१-ॐ ह्रीं अर्हं महामुनये  नमः   -सभी मुनियों में सर्वोत्तम होने से 'महामुनि',

५०२-ॐ ह्रीं अर्हं महामौनिने  नमः   -वचनलाप रहित होने से 'हामौनी ',

५०३-ॐ ह्रीं अर्हं महाध्यानिने  नमः    -शुक्ल ध्यान के ध्यानेसे ,

५०४-ॐ ह्रीं अर्हं महादमाय  नमः    -अतिशय जितेन्द्रिय होने से ,

५०५-ॐ ह्रीं अर्हं महाक्षमाय नमः   -अतिशय समर्थ /शांत होने से

५०६-ॐ ह्रीं अर्हं महाशीलाय  नमः   -उत्तम शील युक्त होने से

५०७-ॐ ह्रीं अर्हं महायज्ञाय नमः   -तपश्चरण रुपी अग्नि में अष्ट कर्मों को होम करने से,

५०८-ॐ ह्रीं अर्हं महामखाय  नमः   -पूज्य होने से,

५०९-ॐ ह्रीं अर्हं महाव्रतपतये  नमः   - -महाव्रतों के स्वामी होने से

५१०-ॐ ह्रीं अर्हं मह्याय  नमः    -जगत्पूज्य होने से

५११- ॐ ह्रीं अर्हं महाकांतिधराय नमः    -(विशाल कांति धारक होने से ),

५१२-ॐ ह्रीं अर्हं अधिपाय    नमः   -(सबके स्वामी  होने से  ),

५१३-ॐ ह्रीं अर्हं महामैत्रीमयाय  नमः   -(सब के साथ मैत्रीभाव   होने से ),

५१४-ॐ ह्रीं अर्हं अमेयाय   नमः   -अपरिमित  गुणों के धारक    होने से ,

५१५-ॐ ह्रीं अर्हं महोपायाय नमः    -(मोक्ष के सर्वोत्तम  उपायों सहित    होने से ),

५१६-ॐ ह्रीं अर्हं महोमयाय नमः   -(तेज स्वरुप  होने से ),

५१७-ॐ ह्रीं अर्हं महाकारुण्यकाय नमः   -अत्यंत दयालु होने से  , 

५१८-ॐ ह्रीं अर्हं मन्त्रे  नमः    -सब  पदार्थों केज्ञाता   होने से  ,

५१९-ॐ ह्रीं अर्हं महामंत्राय  नमः    -अनेक मंत्रों के स्वामी  होने से 

५२०-ॐ ह्रीं अर्हं महायतये   नमः    -यतियों  श्रेष्ठ  होने से 

५२१-ॐ ह्रीं अर्हं महानादाय   नमः    -गंभीर दिव्य ध्वनि के धारक  होने से ,

५२२-ॐ ह्रीं अर्हं महाघोषाय  नमः   -दिव्यध्वनि का गंभीर उच्चारण होने से,

५२३-ॐ ह्रीं अर्हं महेज्याय   नमः    -बड़ी बड़ी पूजाओं के अधिकारी होने से ,

५२४-ॐ ह्रीं अर्हं महसांपतये   नमः    -समस्त तेज/प्रताप के स्वामी है,

५२५-ॐ ह्रीं अर्हं महाध्वरध्रराय  नमः    -ज्ञानरूपी विशाल यज्ञ के  धारक   होने से  ,

५२६-ॐ ह्रीं अर्हं धुर्याय   नमः    -कर्मभूमि का समस्त  भार संभालने अथवा सर्वश्रेष्ठ  होने से,

५२७-ॐ ह्रीं अर्हं महौदार्याय   नमः   -अतिशय उदार  होने से  ,

५२८-ॐ ह्रीं अर्हं महेष्ठ्वाचे   नमः   -श्रेष्ठ वचनों से युक्त  होने से ,

५२९-ॐ ह्रीं अर्हं महात्मने  नमः   -महान आत्मा होने से  ,

५३०-ॐ ह्रीं अर्हं महासांधाम्ने   नमः   -समस्त तेज के स्थान   होने से ,

५३१-ॐ ह्रीं अर्हं महर्षये   नमः   -ऋषियों में प्रधान   होने से 

५३२-ॐ ह्रीं अर्हं महितोदयाय  नमः   -प्रशस्त जन्म के धारक   होने से ,

५३३-ॐ ह्रीं अर्हं महाक्लेशांकुशाय  नमः   बड़े बड़े क्लेशों  के नष्ट करने के लिए अंकुश  समान  होने से ,

५३४-ॐ ह्रीं अर्हं शूराय नमः   -कर्मरुपी शत्रुओं क्षय करने में शूर-वीर  होने से 

५३५- ॐ ह्रीं अर्हं महाभूतपतये नमः   -गंधरादि बड़े-बडे प्राणियों के स्वामी होने से ,,

५३६-ॐ ह्रीं अर्हं गुरुवे  नमः   -त्रिलोक में श्रेष्टम   होने से  

५३७-ॐ ह्रीं अर्हं महापराक्रमाय  नमः   -विशल पराक्रम के धारक  होने से 

५३८-ॐ ह्रीं अर्हं अनन्ताय  नमः   -अन्त रहित   होने से ,

५३९-ॐ ह्रीं अर्हं महाक्रोधरिपवे  नमः  -क्रोध के बड़े शत्रु  होने से ,

५४०-ॐ ह्रीं अर्हं वशीने  नमः   -समस्त इन्द्रियों को नियंत्रित रखने से, ,

५४१-ॐ ह्रीं अर्हं महाभवाब्धिसंतारीणे   नमः   -संसार रूपी महासागर पार करने से ,

५४२-ॐ ह्रीं अर्हं महामोहाद्रिसूदना य   नमः   मोहरूपी महाचल के भेदक    होने से ,,

५४३-ॐ ह्रीं अर्हं महागुणाकराय नमः   -सम्यग्दर्शन आदि बड़े बड़े गुणों से युक्त होने से  ,

५४४-ॐ ह्रीं अर्हं क्षांताय  नमः   -क्रोधादि कषायों के विजयता  होने से ,

५४५-ॐ ह्रीं अर्हं महयोगीश्वराय  नमः   -बड़े बड़े योगियों मुनियों के स्वामी  होने से ,

५४६-ॐ ह्रीं अर्हं शमीने  नमः    -अतिशय शांत परिणामी  होने से 

५४७-ॐ ह्रीं अर्हं महाध्यानपतये  नमः   -महान  शुक्लध्यान के ध्याता होने से  ,

५४८-ॐ ह्रीं अर्हं ध्यानमहाधर्मणे  नमः -अहिंसारूपी महाधर्म के ध्याता होने से 

५४९-ॐ ह्रीं अर्हं महाव्रताय  नमः   -महान व्रतों के धारण करने से

५५०-ॐ ह्रीं अर्हं महाकर्मारिघ्ने  नमः   -कर्मरूपी महाशत्रुओंके विनाशक   होने से,
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श्री जिन सहस्त्रनाम मन्त्रावली षष्ठम अध्याय भाग १ - by scjain - 06-09-2018, 07:33 AM

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