तत्वार्थ सूत्र (मोक्षशास्त्र ) अध्याय ४ सुत्र १ से सुत्र ९ तक
#1

तत्वार्थ सूत्र (मोक्षशास्त्र )
अध्याय ४ 


(आचार्यश्री  उमास्वामी विरचित) 
उर्ध्व लोक का वर्णन  

देवों  के भेद 
देवाश्चतुर्णिकाया: !!१!!
संधि विच्छेद -देवा:+चतुर्णिकाया:
शब्दार्थ :-देवा:-देव ,चतुर्णिकाया-चार निकाय  के होते है 
अर्थ-देवों के चार निकाय /भेद ;भवनवासी,व्यंतर,ज्योतिष्क और वैमानिक है !
भावार्थ -देवगति नामकर्म के उदय से देवगति में उत्पन्न होकर नाना द्वीप,समुद्रों और पर्वत आदि रमणीय स्थानो पर क्रीड़ा करते है उन्हें देव कहते है उन देवों के चार भेद ;भवनवासी,व्यंतर,ज्योतिष्क और वैमानिक है!
विशेष -
उर्ध्व लोक-अनादिनिधन त्रिलोक में मृदंग और तबले के आकार के,जम्बूद्वीप के विदेहक्षेत्र के उत्तर और देवकुरु क्षेत्र में स्थित १०००४० महायोजन ऊँचे सुदर्शन समेंरू पर्वत की चूलिका से १ बाल के अंतराल से ७ राजू ऊँचे उर्ध्व लोक में वैमानिक देवो में इंद्र,देव सोलवे स्वर्ग,तक और उसके ऊपर नव ग्रैयविक,नव अनुदिशों और पांच अनुत्तरों में अहमिन्द्र निरंतर सांसारिक सुखों को भोगते है!सिद्ध शिला के ऊपर तनुवातवलय से शीर्ष स्पर्श करते हुए ५२५ धनुष मोटे और ४५ लाख योजन विस्तार वाले सिद्धालय में अनन्तानन्त सिद्ध परमेष्ठी अनंत चतुष्कक सहित आनंदपूर्वक अनंत कल तक विराजमान है!
भवनत्रिक देवों  के लेश्या का विभाग -
आदितस्त्रिषुपीतान्तलेश्या:!!२!!
संधि विच्छेद -आदितस्+त्रिषु+ पीत+अंत + लेश्या:!!
शब्दार्थ-आदित पहले के, त्रषु-तीनों निकाय के,पीत+अंत-पीत तक,लेश्या:-लेश्याए होती है !
अर्थ-पहले के तीन निकायों के देवो  की पीत  लेश्या तक अर्थात कृष्ण,नील ,कापोत और पीत चारों  लेश्याए होती है !
भावार्थ-आदि के तीन अर्थात भवनवासी,व्यंतर और ज्योतिष्क देवों के कृष्ण,नील,कापोत और पीत चार लेश्याए होती है! 
विशेष-तीनों भवनत्रिक;भवनवासी,व्यंतर और ज्योतिष्क देवों की पर्याप्त अवस्था में सदा एक ही पीत लेश्या पायी जाती है!किन्तु नियम है कि कृष्ण,नील और कापोत लेश्या के मध्यमअंश के साथ मरे हुए कर्मभूमियाँ  मिथ्यादृष्टि मनुष्य और तिर्यंच तथा पीत लेश्या के मध्यमअंश से मरे भोगभूमियाँ मिथ्यादृष्टि भवनत्रिक में उत्पन्न होते है,इसीलिए इनकी अपर्याप्त(विग्रहगति में निर्वतपर्याप्तक अवस्था की अपेक्षा) अवस्था में कृष्ण,नील और कापोत लेश्या होती है इसके अतिरिक्त इनकी पीत लेश्या ही होती है !इसीलिये यहाँ भवनत्रिको की चार लेश्याए बताई है !
निष्कर्ष-यहाँ भाव लेश्या की अपेक्षा वर्णन है द्रव्य लेश्या तो पीत ही होती है!कोई जीव मरण कर देवगति में गमन करता है तो अपर्याप्त अवस्था में देवों की वही लेश्या होती है जिसमे मरण हुआ है!परन्तु पर्याप्त अवस्था  में सिर्फ पीत लेश्या होती है!
चार निकायों के देवों के प्रभेद-
दशाष्टपञ्चद्वादशविकल्पा:कल्पोपपन्न पर्यन्ता: !!३!! 
संधि विच्छेद:-दश+अष्ट+पञ्च+द्वादश+विकल्पा:+कल्पोपपन्न+पर्यन्ता:
शब्दार्थ-
दश-दस,अष्ट-आठ,पञ्च-पांच,द्वादश-बारह,विकल्पा:-भेद से,कल्पोपपन्न-सोलहवे स्वर्ग ,पर्यन्ता:-तक  
अर्थ-कल्पोपपन्न अर्थात १६ वे स्वर्ग तक देवों  के क्रमश: दस, आठ,पांच और १२ भेद है!
भावार्थ- भवनवासी-दस,व्यतर-आठ,ज्योतिष्क-५ और वैमानिक देवों  के (सोलहवे स्वर्ग तक) बारह  भेद है!
शंका -१६वे स्वर्ग तक इन्द्रों की अपेक्षा बारह भेद कैसे होते है ?
समाधान- वैमानिक देवों  के दो भेद है!
कल्पोपन्न-सोलहवे स्वर्ग तक उत्पन्न होने वाले देव और
कल्पातीत-सोलहवे  स्वर्ग से ऊपर नव ग्रैवियक,अनुदिशो और पांच अनुत्तरों में उत्पन्न होने वाले देव !
पहले के चार स्वर्गों और अंतिम के चार स्वर्गों में एक एक इंद्र होते है ,मध्य के आठ स्वर्गों में दो-दो स्वर्गों में एक-एक इंद्र  होते है!इस प्रकार १६ स्वर्गों में बारह इन्द्रो की व्यवस्था है !१६ स्वर्गों में बारह  ही प्रतीन्द्र है!

देवों  के  निकायोँ में सामान्य भेद -
इन्द्रसामानिकत्रायस्त्रिंशपारिषदात्मरक्षलोकपालानीकप्रकीर्णकाभियोग्यकिल्विष्काश्चैकश:-!!४!!
संधि-विच्छेद-इन्द्र+सामानिक+त्रायस्त्रिंश+पारिषत्+आत्मरक्ष+लोकपाल+अनीक+प्रकीर्णक+आभियोग्य+किल्विष्का:+च+ एकश:-
शब्दार्थ 
इन्द्र-इन्द्र,सामानिक-सामानिक,त्रायस्त्रिंश-त्रायस्त्रिंश,पारिषत्-पारिषद्,आत्मरक्ष-आत्मरक्ष,लोकपाल-लोक पाल,अनीक-अनिक,प्रकीर्णक-प्रकीर्णक,आभियोग्य-आभियोग्य,किल्विष्का:-किल्विषक,च+और,एकश:-प्रत्येक के !
अर्थ-उक्त चारों निकाय के देवों में,प्रत्येक के इंद्र,सामानिक,त्रायस्त्रिंश,पारिषद्,आत्मरक्ष,लोकपाल,अनिक, प्रकीर्णक,आभियोग्य,किल्विषिक दस दस भेद होते है!
भावार्थ-
१-इंद्र-अन्य देवों से भिन्न,अणिमादि ऋद्धियों के धारक एवं परमैश्वर्य को प्राप्त देवों के स्वामी को इंद्र कहते है !
२-सामानिक-आयु,शक्ति,परिवार,भोगोपभोग की अपेक्षा इंद्र के सामान किन्तु आज्ञा देने रूप ऐश्वर्य से रहित देवों  सामानिक देव कहते है !
३-त्रायस्त्रिंश-आदर और सत्कार की अपेक्षा से जो ३३ देव पिता,मंत्री,पुरोहित या गुरु के तुल्य होते है उन्हें त्राय स्त्रिंश देव कहते है!
४-पारिषद्-इन्द्रों की सभा के सदस्य देवों को पारिषद् देव कहते है !
५-आत्मरक्ष-अंगरक्षक के समान रक्षा करने वाले देवों को आत्मरक्ष देव कहते है !
६-लोकपाल-कोतवाल के समान देवों  को लोकपाल कहते है!
७-अनिक-पैदल आदि सात प्रकार की सेना में विभक्त देवों को अनिक देव कहते है!
८-प्रकीर्णक-नगर वासियों के तुल्य , निवासी जनता को प्रकीर्णक देव कहते है !
९-आभियोग्य-जो देव हत्थे,घोडा आदि विक्रिया कर देवों के रथ आदि को खींचते है वे आभियोग्य देव है ,जैसे जो देव ऐरावत हाथी बनते है वे आभियोग्य जाति के देव होते है !
१०-किल्विषिक-चांडालादि की भांति अस्पर्शीनीय,पापी देवों को किल्विषिक देव कहते है !
इनमे इंद्र ऐश्वर्य के द्योतक है!
व्यंतर और ज्योतिष्क देवों  में दस से कम अर्थात आठ भेद होते है -
त्रायस्त्रिंशलोकपालवर्ज्याव्यन्तरज्योतिषिका: !!५!!
संधि विच्छेद-त्रायस्त्रिंश+लोकपाल+वर्ज्या+व्यन्तर+ज्योतिषिका:
शब्दार्थ-त्रायस्त्रिंश-त्रायस्त्रिंश,लोकपाल-लोकपाल,वर्ज्या-वर्जित है(नही होते),व्यन्तर-व्यन्तर,ज्योतिषिका: -ज्योतिष्क में !
भावार्थ-उक्त  सूत्र ४ में, देवों के सामन्य १० भेद कहे किन्तु व्यंतर और ज्योतिष्क देवों में त्रायस्त्रिंश और लोकपाल नहीं होते  इन दो के अतिरिक्त आठ ही भेद होते है ! 
विशेष -
त्रायस्त्रिंश और लोकपाल पद हेतु देवों  में, विशेष पुण्य के अभाव में,यथायोग्य विशेष गुणों के उत्पन्न  नही होने से व्यंतर/ज्योतिष्कदेवों में उनका सर्वथा अभाव होता है!(सदर्भ-श्लोकवार्तकि विरचित आ,विद्यानन्द जी) 
देवों  में इन्द्रों की व्यवस्था -
पूर्वयोर्द्वीन्द्रा:-!!६!!
संधि विच्छेद-पूर्वयो :+द्वी +इंद्रा:-
शब्दार्थ -पूर्वयो:-पूर्व के दो निकायों अर्थात भवनवासी और व्यन्तर देवों में, द्वी-दो-दो इंद्रा:-इंद्र होते है
अर्थ-पूर्व के दो;भवनवासी और व्यन्तर देवों में दो-दो इंद्र होते है !
विशेषार्थ-
१-भवनवासी में १० भेदो में २० इंद्र और व्यन्तर के आठ भेदो में सोलह इंद्र होते है इतने ही प्रतीन्द्र होते है!
भवनवासी  में असुरकुमार जाति  के चामर और वैरोचन ,नाग कुमार के धरणानन्द -भूतानन्द,विद्युतकुमार के सुघोष-महाघोष ,सुपर्णकुमार के वेणु-वेणुधारी ,अग्निकुमार के अग्निशिख-अग्निवाहन,वाट कुमार के वैलम्ब-प्रभंजन,स्तनितकुमार के हरिषेण-हरिकांता,उद्विकुमार के जलप्रभ-जलकांत,द्वीपकुमार के पूर्ण-पूर्ण विशिष्ठ ,दिक्कुमार के अमितगति-अमित वाहन, ये कुल २० इंद्र भवनवासी के है !इसी प्रकार व्यंतर देवों के १६ इंद्र है    
२-किसी एक निकाय में एक इंद्र का होना विशेष पुण्य का सूचक है किन्तु इन दो निकायों के देव इस विशेष पुण्य से  रहित होते है इसलिए इनमे,दोनों इन्द्रो के मध्यस्थ सब कुछ ऐश्वर्य,सुखादि विभाजित होकर बट जाता है !
३- पूर्वयो द्विवचन में है इसलिए पूर्व के दो निकाय भवनवासी और वयंतर देवों  को  ग्रहण किया  गया है 
देवों  में कामसेवन की विधि-
कायप्रवीचाराआऐशानात्  !!७!!
संधि विच्छेद -काय+प्रवीचारा+आ+ऐशानात् 
शब्दार्थ-काय-शरीर द्वारा ,प्रवीचारा-काम सेवन,आ-पर्यन्त ,ऐशानात् -ऐशान स्वर्ग 
अर्थ-ऐशान स्वर्ग के देव काय से काम सेवन करते है !
भावार्थ-भवनवासी,व्यंतर,ज्योतिष्क और ऐशान  स्वर्ग तक के देव  अपनी अपनी  देवियों के साथ मनुष्य एवं तिर्यन्चों  के समान शरीर से  काम सेवन (मैथुन) करते है !
शंका-वैक्रयिकशरीर में सप्त धातुओं का अभाव होता है फिर मनुष्यों/तिर्यन्चों की भांति कामसेवन कैसे संभव है?
समाधान-उनके शरीर में धातु के अभाव में भी मनुष्यवत् क्रियाएँ होती है जिनसे उन्हें मनुष्यवत् काम  सुख   की अनुभूति होती  है !देवों का वैक्रयिक शरीर धातु रहित होता है!
नोट - किसी भी शास्त्र जी में नहीं लिखा है की वैक्रयिक शरीर में धातु होती ही नहीं बल्कि आचार्यों ने तो लिखा ही कि नारकियों के शरीर सड़े रुधिर मांस आदि से निर्मित होता है!(सदर्भ रतनलाल जैन बैनाड़ा जी पाठशाला )!
माघ शुक्ल नवमी ,१६ -२-१६

तत्वार्थ सूत्र (मोक्षशास्त्र )
अध्याय ४ 
(आचार्यश्री  उमास्वामी विरचित) 
उर्ध्व लोक का वर्णन  (आगे) 

शेष स्वर्गों में कामसेवन की रीति -
शेषा:स्पर्शरूपशब्दमन:प्रवीचारा: !!८!!
संधि विच्छेद -शेषा:+स्पर्श+ रूप+ शब्द+ मन:+ प्रवीचारा:
शब्दार्थ -शेषा:-शेष,स्पर्श-स्पर्श, रूप -रूप,शब्द-शब्द , मन:-मन,प्रवीचारा-काम सेवन कर लेते है !
अर्थ-दुसरे ऐशान्त स्वर्ग से ऊपर के स्वर्गों में क्रमश:देव;
१-देवियों के स्पर्श मात्र से,
२-उनके मात्र रूप अवलोकन कर
३-उनके शब्दों मात्र  को सुनने से और  
४- उनका  मन में मात्र चिंतन करने से कामसेवन करते है !
भावार्थ १-तीसरे-सनत्कुमार और चौथे-माहेंद्र  स्वर्ग के देव,अपनी अपनी देवियों के आलिंगन मात्र से,
२-पांचवे-ब्रह्म,छठे-,ब्रह्मोत्तर,सातवे-लान्तिव और आठवें-कापिष्ट स्वर्गों के देव अपनी अपनी देवियों का मात्र  रूप देख कर ,
३-नौवे-शुक्र,१०-महाशुक्र,११वे-शातार और १२-सहस्रार स्वर्गों के देव अपनी अपनी देवियों के मात्र शब्द सुन कर और 
४-१३वे-आनत,१४वे-प्राणत,१५वे आरणव,और १६वे अच्युत स्वर्ग के देव अपनी अपनी देवियों का मात्र  मन में
चिंतन कर प्रवीचार से ही तृप्त हो जाते है !
विशेष-
१-देवियाँ प्रथम दो स्वर्गों में ही उत्पन्न होती है!पहले स्वर्ग में पहिले,विषम संख्या के  तथा दुसरे स्वर्ग मेंसम संख्या के स्वर्ग के देवों  की देवियों उत्पन्न होती है!अपने अपने स्वर्गों में अपनी अपनी देवियों की उत्पत्ति का अवधि ज्ञान द्वारा पता लगने  पर उन्हें देव आकर अपने अपने स्वर्गो में ले जाते है !
२-भवनवासी,व्यंतर,और ज्योतिष्क देवों की देवियों उनके भवनों/विमानों में ही उत्पन्न होती है !
 कल्पातीत देवों में प्रवीचार का निषेध 
परेऽप्रवीचाराः॥९॥
संधि विच्छेद-परे+अप्रवीचाराः
शब्दार्थ-परे- वहां से आगे(सोलहवे स्वर्ग से ऊपर) ,अप्रवीचाराः-कामसेवन नहीं है 
अर्थ:-सोलहवे स्वर्ग से ऊपर अर्थात ९ ग्रैवियक,९अनुदिशों और ५ अनुत्तरों के कल्पातीत देवों  में काम सेवन नहीं होता  है !
भावार्थ-१६ वे स्वर्ग से ऊपर ९ ग्रैवियक,९ अनुदिशों और ५ अनुत्तरों के देवों में काम सेवन नहीं होता  है क्योकि कारण के अभाव में कार्य नहीं हो सकता,वहां देवियाँ ही नहीं होती है इसलिए  इच्छा  ही नहीं होती !
 विशेष-
१-ब्रह्मलोक के ब्रह्मऋषि;लौकांतिक देवों के भी काम प्रवीचार नहीं होता है उनके निकट  भी देवियों का प्रवेश निषेध है !पुरुषवेद का उदय नौवे गुणस्थान के मध्य तक रहता है किन्तु इन जीवों में  उसका मंद उदय होने से  उसके निराकरण की इन्हे आवश्यकता ही नहीं होती है!
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अधिक जानकारी के लिए.... 
तत्वार्थ सूत्र (Tattvartha sutra)
अध्याय 1 
अध्याय 2
अध्याय 3
अध्याय 4
अध्याय 5
अध्याय 6
अध्याय 7
अध्याय 8
अध्याय 9
अध्याय 10

Manish Jain Luhadia 
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