तत्वार्थ सूत्र अध्याय ६ भाग १
#1

तत्वार्थ सूत्र(मोक्ष शास्त्र जी )  
(आचर्यश्री उमास्वामी जी रचित)
अध्याय ६- आस्रव

आस्रव-जो शरीर,वचन अथवा मन की क्रिया से आत्म प्रदेशों में परिस्पंदन होता है उसे  योग  कहते है!योगो की प्रवृत्ति से आत्मप्रदेशों में कर्मों का आस्रव होता है,कर्मों के आत्मप्रदेशों में आगमन को आस्रव कहते है!शुभ और अशुभ योग से क्रमश; दोनों प्रकार शुभ और अशुभ कर्मों का आस्रव होता है,जिस योग की प्रधानता होती है उसके अधिक और दुसरे के कम कर्म बंधते है!हमारे आत्मप्रदेशों में ही कर्मवर्गणाये,पुद्गल वर्गणाओं रूप में रहती है,जैसे ही हम मन,वचन,अथवा काय से कोई क्रिया करते है वे कर्माणपुद्गल वर्गणाए,आत्मप्रदेशों में परिस्पन्द करने से कर्म रूप बंध जाती है!यह समस्त क्रिया बंध और आस्रव है,कर्मों का आस्रव-बंध एक ही समय युगपत् होता है!
इस अध्याय में उमास्वामी आचार्यश्री २७  सूत्रों के माध्यम से तीसरे 'आस्रव' तत्व के कारणों, उस के भेद,जीवाधिकरण,अजीवाधिकरण और अष्ट कर्मों के आस्रवों के कारणों पर उपदेश देते हुए प्रथम सूत्र में योग को परिभाषित करते है-
आस्रव क्यों होता है-
कायवाड.मन:कर्मयोग: !!१!!

संधिविच्छेद:-काय+वाड.+मन:+कर्म+योग:
शब्दार्थ:-काय-शरीर,वाड.-वचन,मन:-मन की,कर्म-क्रिया,योग:-योग है!

अर्थ-काय-शरीर ,वचन और मन की क्रिया योग है
भावार्थ-शरीर,वचन अथवा मन की क्रिया से आत्मप्रदेशों में परिस्पंदन(हलन-चलन,/
संकोच-विस्तार) को योग कहते है!योग के निमित्त,सामान्य से ३ और विशेष से १५  है!

 आत्मप्रदेशों में परिस्पंदन काया,वचन और मन की,क्रिया से क्रमश: काययोग, वचनयोग और मनोयोग कहलाता है!
काययोग-वीर्यान्तरायकर्म के क्षयोपशम से होने पर औदारिकादि;सात प्रकार की कायवर्गणाओं में से किसी एक वर्गणा की सहायता से जो आत्मप्रदेशों में परिस्पंदन होता है,उसे काययोग कहते है !
काययोग के भेद:-सात-१-औदारिक,२-औदारिकमिश्र,३-वैक्रियिक,४-वैक्रियिकमिश्र,५-आहारक,६-आहरकमिश्र तथा ७-कार्मण काययोग!

स्पर्शन,रसना,घ्राण,चक्षु और श्रोत पंचेन्द्रियां भी काय में ही गर्भित है !
वचनयोग-वीर्यान्तरायकर्म के क्षयोपशम होने से जीव में वाग्लाबधि प्रकट होती है और वह बोलने के लिए ततपर होता है,तब वचनमर्गणा के निमित्त से जो आत्मप्रदेशों में परिस्पंदन होता है उसे वचन योग कहते है !
वचनयोग के भेद:-चार;

१-सत्यवचनयोग- वचनों में सत्यत्व हो,२-असत्यवचनयोग-वचनों में असत्यत्व हो,३-उभयवचनयोग-वचनों में सत्यत्व और असत्यत्व  दोनों हो ,तथा४- अनुभयवचनयोग-वचनों में सत्यत्व  और असत्यत्व दोनों ही नही हो  और
मनोयोग वीर्यान्तरायकर्म और नो इन्द्रयावरणकर्म के क्षयोपशम से मनोलब्धि के होने पर तथा मनो वर्गणा के आलंबन के निमित्त से,जीव के चिंतन के लिए ततपर,आत्म प्रदेशों में परिस्पंदन होता है,वह मनोयोग कहलाता है
मनोयोग के भेद:-चार;

१-सत्यमनोयोग-मन में सत्यत्व ,२-असत्यमनोयोग -होमन में असत्यत्व हो,३-उभयमनोयोग-मन में सत्यत्व और असत्यत्व दोनों हो ,४-अनुभयमनोयोग-मन में  सत्यत्व  और असत्यत्व   दोनों ही नही हो  इस प्रकार तीनो;,काय,वचन और मन,योगो के कुल १५ उत्तर भेद है!
विशेष 

१-वर्तमान में हमारे चारों मनोयोग,चारों वचनयोग और औदारिक काययोग,कुल ९ में से,एक समय में एक ही योग हो सकता है!हमें भ्रान्ति हो सकती है कि जब हम चलते है,उसी समय बोलते भी है,   उसी समय चिंतवन भी करते है,किन्तु वास्तव में ऐसा होना असंभव है!जब मनोयोग,वचनयोग अथवा काययोग का कोई भी एक भेद हो रहा हो तब योग का अन्य कोई भेद नहीं हो सकता!आत्मा का उपयोग जिस ऒर होता है,वही योग होता है अन्य नहीं! जब हम सोचते है,उस समय मनोयोग ही होता है चाहे हम संस्कार वश उसी समय शरीर से भाग भी रहे हो,किन्तु आत्मा का उपयोग उस ऒर नहीं हो रहा होता है, अत: उस समय काययोग नहीं होता है!जब हम टी.वी पर कोई कार्यक्रम देखते है,उस समय हमें चक्षुइंद्री से देखने और कर्ण इंद्री से सुनने की अनुभूति एक साथ होती है किन्तु वास्तव में ऐसा होता नहीं है क्योकि एक समय में हम आत्मा का उपयोग एक ही ऒर लगा सकते है!इस का प्रमाण है कि हम टी.वी.पर प्रवचन सुनते समय उसको निर्विघ्न काय (हाथ)से साथ-साथ लिख नहीं पाते है!
२-केवली भगवन के दो वचन योग:-१-सत्यवचनयोग-वचन सत्य होने के कारण,२-अनुभय वचन योग:-भाषा अनुभय होने के कारण तथा दो मनो योग:-१ सत्यमनोयोग-सत्य वचन बोलने से पहले जो मन का उपयोग सत्य बोलने के लिए हुआ,उस कारण और,२-अनुभय मनोयोग-अनुभय वचन होने के कारण!उनके तीन काययोग होते है!सामान्य से जब वे समवशरण में विराजमान रहते है अथवा विहार करते है तब उनका औदारिक काययोग होता है!उनका दंड-समुदघात में औदारिककाययोग,कपाट समुद घात में औदारिकमिश्र काययोग और प्रतर व लोकपूर्ण समुद्घात में कार्माण काय योग होता है।
विशेष-वीर्यान्तराय और ज्ञानावरण के क्षय होने पर सयोगकेवली के तीन;वर्गणाओं; काय, वचन और मन  की अपेक्षा जो आत्म प्रदेश में परिस्पंदन होता है वह कर्म क्षय निमित्तक योग है !जो की १३ वे गुणस्थान तक ही रहता है आयोग केवली के तीनों वर्गणाओं का आगमन रुक जाता है!जिससे वहां योग का अभाव हो जाता है !

३- योग के आठ अंग -
१-यम :-अहिंसा,सत्य ,अस्तेय ,ब्रह्मचर्य व  अपरिग्रह रूप मन वचन काय का संयम यम है !
२-नियम:-शौच ,संतोष,तपस्या। स्वाध्याय,व् ईश्वर प्रणिधान ये नियम है !
३-आसान:-पद्मासन ,वीरासन ,आसान है 
४-प्राणायाम -श्वासोच्छ्वास का गति निरोधप्राणायाम है !
५-प्रत्याहार-इन्द्रियों को अंतर्मुखी करना प्रत्याहार है !
६-धारणा -विकल्पपूर्वक किसी एक काल्पनिक ध्येय में चित्त को नष्ट करना धारणा है 
७-ध्यान-ध्यान,ध्याता व् ध्येय  को एकाग्र प्रवाह ध्यान है !
८-समाधि-ध्यान,ध्याता व ध्येय रहित निवृत्त चित्त समाधि है !
चित्त (मन )की पांच अवस्थाये-
१-क्षिप्तचित्त-चित्त का संसारी विषयो में भटकना !
२-मूढ़चित्त-चित्त का निंद्रा आदि में  रहना !
३-विक्षिप्तचित्त-सफलता-असफलता के झूले में झूलना !
४-एकाग्रचित्त-एक ही विषय में केंद्रित रहना !
५-निरुद्धचित्त-समस्त प्रवृत्तियों का रुक जाना !,
४-५ वी अवस्थाये योग के लिए उपयोगी है !
चित्त (मन) के रूप -
१-प्रख्या-अणिमा आदि ऋद्धियों की अनुरक्ति/प्रेमी प्रख्या है 
२-प्रवृत्ति-विवेक बुद्धि के जागृत होने पर चित्त धर्ममेय समाधि में स्थित हो जाता है तब पुरुष का बिम्ब चित्त पर पड़ता है और चेतनवत् कार्य करने लगता है!यही चित्त की प्रवृत्ति है !
९-३-१६ 
स आस्रव: -२
संधि विच्छेद-स+आस्रव:
शब्दार्थ- स=वह (योग जो पिछले सूत्र में कहा है), आस्रव:-आस्रव है!
अर्थ वह तीन प्रकार का योग ही आस्रव है
भावार्थ-त्रियोगों;मन,वचन और काय के द्वारा आत्माप्रदेशों में परिस्पंदन अर्थात योग ही पुद्गलकर्म वर्गणाओ का आत्मा की ऒर आने का कारण,आस्रव है!

विशेष-
१-कर्मों के आत्मा में आने के द्वार को आस्रव १५ भेद वाला  योग है!कार्मणवर्गणाओ का कर्म रूप परिणमन आस्रव है!
२-जीव निरंतर मन,वचन,काय त्रियोगों में सोते-जागते प्रतिसमय प्रवृत्त रहता है,इसीलिए उसके प्रतिसमय कर्मों का आस्रव होता है यहाँ तक की जब आत्मा वर्तमान एक शरीर को त्याग कर विग्रह्गति में दुसरे भव के शरीर को धारण करने के लिए गमन करते समय भी उसमे क्रिया होती है,कर्मो का आस्रव होता है!
३-१३वे गुणस्थानवर्ती मुनिराज के भी कर्मो का आस्रव होता है!
४--जिस प्रकार कुए के भीतर पानी आने में झिरे कारण है उसी प्रकार आत्मा के कर्म आने में योग कारण है!यद्यपि योग आस्रव में कारण है तथापि सूत्र में कारण में कार्य का उपचार कर उसे ही आस्रव कह दिया है!जैसे प्राणों की स्थिति में कारण अन्न को ही प्राण कह देते है!
आस्रव का स्वरुप -
शुभ:पुण्यस्याशुभ:पापस्य: ३

संधि-विच्छेद-शुभ:+पुण्यस्य+अशुभ:+पापस्य:
शब्दार्थ-शुभ:-शुभ(योग),पुण्यस्य-पुण्यकर्म और अशुभ:-अशुभ(योग),पापस्य-पापकर्म आस्रव है
अर्थ-शुभयोग पुण्यकर्म और अशुभयोग पापकर्म के आस्रव का कारण है
भावार्थ-शुभयोग-शुभ;मन वचन काय की प्रवृत्तियां(क्रियाये) जैसे;पूजा,पाठ,स्वाध्याय,धर्म ध्यानादि शुभ/पुण्यकर्मो का और अशुभयोग-अशुभ;मन;वचन,काय की प्रवृत्ति(क्रियाये) जैसे;सांसारिक राग-द्वेष, पंच पापों में लिप्ता आदि अशुभकर्मों-पापकर्मों का आस्रव होता है!
विशेष-१-जब हम धार्मिक कार्यो में प्रवृत्त रहते है उस समय हमें शुभ-पुण्यकर्मो का आस्रव तभी होगा जब हमारा अभिप्राय,पूजा की क्रिया विधि,और परिणाम दोनों ठीक होंगे अन्यथा अशुभ पाप कर्मों का ही आस्रव होता है!
अभिप्राय-मान लीजिये पूजा-पाठ आदि करने के पीछे हमारा अभिप्राय,सांसारिक सुखों की पूर्ती की इच्छाए है तब हमें कर्मों का पुण्यास्रव नहीं होगा,पापास्रव ही होगा क्योकि हम संसार से मुक्त होने की इच्छा नहीं रख रहे है!
शंका-१  अपने समय का श्रावक सदुपयोग कैसे करे?
समाधान-मन,वचन और काय की प्रवृत्ति अशुभ विकल्प रहित होंगी तब पुण्यास्रव होगा   अन्यथापापास्रव होगा!आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी के अनुसार हमें अपने समय;२४ घंटो को ८-८ घंटे के ३ भागों में ,
 विभक्त करना चाहिए!प्रत्येक ८-८  घंटे; धार्मिककार्यो,व्यावसायिक कार्यों और काम अर्थात शरीर के लिए रखने चाहिये!
शंका:-२ शुभकर्म के आस्रव का कारण शुभयोग और अशुभकर्म के आस्रव का कारण अशुभयोग है,यदि ऐसा लक्षण कह दिया जाये तो क्या हानि है? 
समाधान-यदि ऐसा लक्षण कह दिया जाए तो शुभ का अभाव हो जाएगा क्योकि आगमानुसार जीव के आयुकर्म के अतिरिक्त,सातों कर्मों का आस्रव प्रतिसमय होता है,अत: शुभयोग में भी ज्ञानावरण आदि पापकर्मों का आस्रव/बंध होता है,इसलिए उक्त कथन आगम विरुद्ध है !
शंका-३ जब शुभयोग से भी घातिया कर्मों का बंध होता है तो सूत्र में क्यों कहा है की शुभयोग से पुण्यकर्म का आस्रव/बंध  होता है?
समाधान-
घातियाकर्मों की अपेक्षा से नहीं,अघातिया(वेदनीय,आयु,नाम और गोत्र) कर्मों की अपेक्षा से कहा गया है!अघातिया कर्मों के पुण्य और पाप दो भेद होते है!शुभयोग से पुण्यकर्म का और अशुभयोग से पापकर्म का आस्रव होता है!शुभयोग रहते हुए भी घातिया कर्मों का अस्तित्व रहता है,उनका उदय भी रहता है और उसी से घातिया कर्म का बंध भी होता है !

१०-३-१६

साम्परायिक आस्रव के स्वामी की अपेक्षा दो भेद:-
सकषायाकषाययो:साम्परायिकेर्यापथयो:!४!

संधिविच्छेद-सकषाय+अकषाययो:+साम्परायिक:+ईर्यापथयो:
शब्दार्थ-सकषाय-कषायसहित और अकषाययो-कषायरहित जीवों के क्रमश: साम्परायिक-साम्परायिक आस्रव(कर्मो का आत्मा के पास आकर रुकना) और ईर्यापथयो-ईर्यापथ आस्रव (कर्मों का आत्मा के पास आकर नहीं रुकना अर्थात बिना रुके चले जाना) कहलाता है!
अर्थ-चार कषायों(क्रोध,मान,माया और लोभ) सहित जीवों के साम्परायिक और कषाय रहित जीवों के ईर्यापथ आस्रव होता है
भावार्थ-कषाय सहित जीवों के १० वे गुणस्थान तक साम्परायिक आस्रव होता है क्योकि कषाय १०वे गुणस्थान के बाद नहीं रहती!
ईर्यापथ आस्रव-स्थिति और अनुभाग रहित कर्मों के आस्रव को ईर्यापथ आस्रव कहते है इस में, कर्म की स्थित १ समय की भी नहीं होती,वे आकर चले जाते है,क्योकि कषाय के अभाव में उन्हे बंधने का अवसर नहीं मिलता!कषाय रहित जीवों के केवल,योग के (सद्भाव में)कारण ११,१२,१३ वे गुणस्थान में ईर्यापथ आस्रव होता है,१४ वे गुणस्थान में योग के अभाव में वह भी नही रहता !
साम्परायिक आस्रव के भेद-


इन्द्रियकषायाव्रतक्रिया:पञ्चचतु:पञ्चपञ्चविंशतिसंख्या:पूर्वस्यभेदा:!५!संधिविच्छेद:-इन्द्रिय+कषाय+अव्रत+क्रिया:+पञ्च+चतु:+पञ्च+पञ्चविंशति+संख्या:+पूर्वस्य+भेदा:
शब्दार्थ-इन्द्रिय-इन्द्रिय,कषाय-कषाय,अव्रत-पाप,क्रिया:-क्रिया के क्रमश: ,पञ्च-पांच,चतु:-चार,पञ्च-पाच, और पञ्चविंशति-पच्चीस,संख्या:-भेद,पूर्वस्य-उप्र के सूत्र में पहले वाले/साम्परायिक आस्रव,भेदा:-भेद है!
अर्थ-पूर्वसूत्र में पहिले,साम्परायिक आस्रवके इन्द्रिय,कषाय,पापो,क्रिया की अपेक्षा क्रमश:५,४,५,२५ भेद है
भावार्थ-साम्परायिक आस्रव के ३९;पञ्चइन्द्रिय 
विषयों(स्पर्श,रसना,घ्रण,चक्षु और कर्ण)-,४ कषायों (क्रोध,मान,माया और लोभ),५-पापो(हिंसा,चोरी,झूठ,कुशील और परिग्रह)और २५ क्रियाये,भेद है!
विशेष-
१-जीव के ३ योगो;मन,वचन,काय से ५-इन्द्रिय विषयों में,४-कषाय;क्रोध,मान,माया लोभ ,५-पापों; हिंसा, झूठ, चोरी,कुशील,परिग्रह  तथा २५-क्रियाओं रूप प्रवृत्ति होने(विशेषत:सम्यक्त्व और मिथ्यात्व क्रिया) से,साम्परायिक आस्रव होता है!
सम्यक्त्व क्रिया-
सम्यक्त्व की वृद्धि करने वाली क्रिया अर्थात सच्चे देव,शास्त्र, गुरुकी भक्ति आदि करना,सम्यक्त्व क्रिया है !
सच्चेदेव-
वीतराग,हितोपदेशी,सर्वज्ञ,सच्चे देव है!
सच्चे शास्त्र-“भव्य जिन(जिनेन्द्र देव) की वाणी” है,जिनवाणी सच्चे शास्त्र है!
सच्चे गुरु-२८ मूलगुण धारी निर्ग्रन्थ गुरु सच्चे गुरु है! एक भी मूल गुण कम होने पर वे सच्चे गुरु की कोटि में नहीं आते है!
 
साम्प्रायिक आस्रव के होने में कारण २५-क्रियाये -
१-सम्यक्त्व-सम्यक्त्व की अभिवृद्धि करने वाली देव,शास्त्र,गुरु की पूजन आदि क्रियाये है!
इन की वृद्धि हेतु सच्चे,देव,शास्त्र,गुरु के स्वरुप को समझकर उनकी पूजा,भक्ति, अराधना, मनोयोग से करनी चाहिए!इसी से सम्यगदर्शन,सम्यग्ज्ञान,सम्यक्चरित्र  प्राप्त हो सकता है!
 हमारे अराध्य मात्र ९;देव,पंच परमेष्ठी,जिनवाणी,जिनधर्म,जिनचैत्यालय और जिनबिम्ब है!इनके अतिरिक्त अन्य देवी-देवता हमारे अराध्य/पूजनीय नहीं है!इनसे बचते हुए सम्यक्त्व में वृद्धि करनी चाहिए!अन्यथा दर्शनमोहनीय कर्म का बंध पुष्ट होगा!इस मनुष्य पर्याय का भरतक्षेत्र में जन्म लेने के लाभ से वंचित रह जायेगे!हमारी मनुष्यपर्याय,जिसमे अपना कल्याण कर सकते है,व्यर्थ जायेगी !सम्यक्त्व क्रियाये पुण्य के बंध और संसार से मुक्ती का कारण है,मिथ्यात्व क्रियाये घोर पापबंध और संसार का कारण है!

२-मिथ्यात्वक्रियाये-सम्यक्त्व क्रिया के विपरीत,मिथ्यातव  वृद्धि हेतु  सच्चे,देव,शास्त्र, निर्ग्रन्थ गुरु, जिनवाणीआदि के अतिरिक्तअन्य;देव शास्त्र गुरु,धर्म,भक्ति,सेवामें अनुरक्त रहना मिथ्यात्व क्रियाये है!
आज हम जैन लोग,नवरात्रि पूजा करने लगे है जिसका जैन शास्त्रों में कोई विधान नहीं है,नवग्रह विधान में लग रहे है,ये नवगृह हमारा कुछ भी अच्छा-बुरा नहीं कर सकते!ये क्रियाये आगमविरुद्ध है!जैनी शनि अमावस्या मनाने लगे है,सभी देवी-देवताओं के मंदिर बनने लगे है,नवग्रह अष्ट निवारक मंदिर बनने लगे है,शनि वार को मुनिसुव्रत भगवान् की पूजा,शनि गृह के प्रकोप के निवारण हेतु करने लगे है,यह धारणा बिलकुल आगम विरुद्ध है!समस्त सिद्ध भगवानो की क्षमता में  मात्र  भी अंतर नहीं है!मिथ्यात्व और कुदेव,कुशास्त्रों,कुगुरू के चक्कर में पड़कर हम आज अपना वर्तमान जीवन और परलोक भी नष्ट कर रहे है! हमें सन्मार्ग दिखाने वाले गुरु भी आज हमें मिथ्यात्व की ऒर ले जाने लगे है!वे कहने लगे नवग्रह,देवी,देवताओं की पूजा करो!ये सब मिथ्यात्व क्रिया है!आज बहुत सी जैन महिलाए करवा चौथ का व्रत,अन्य धर्मों के अनुसरण में रखने लगी है,जिसका विधान जैनागम में नहीं है!अन्य धर्मो के त्योहारों को हम मानने लगे है,ये सब क्रियाये मिथ्यात्व की वृद्धि है,जिनसे बच कर हमें अपने धर्म के प्रति श्रद्धा प्रगाढ़ करनी चाहिए!इनसे बचे क्योकि पञ्च इन्द्रियों के विषयों में,चार कषायों,पञ्च अव्रत व २५ क्रियाओं में यदि हम अपना उपयोग लगा रहे है,तब साम्परायिक आस्रव होगा
३-प्रयोग क्रिया-शरीर आदि से गमनागमन रूप प्रवृत्ति,प्रयोग क्रिया है!
४-समादान क्रिया-संयमी का असंयम की ओर अभिमुख होना,समादान क्रिया है!
५-ईर्यापथ क्रिया-ईर्यापथ गमन हेतु क्रिया ईर्यापथ गमन क्रिया है!
६-प्रदोषिक क्रिया-क्रोध के आवेश में होने वाली द्वेषादिक रूप क्रिया,प्रदोषिक क्रिया है!
७-कायिकी क्रिया-मारना,गाली देना,आदि दुष्टता पूर्ण क्रियाये कायिकी क्रिया है !
८-आधिकारणि क्रिया-हिंसादि के उपकरण तलवार,पिस्टल,बंदूकआदि ग्रहण करना,आधिकारणि क्रिया है
९-परितापि की क्रिया-प्राणियों को दुखी करने वाली क्रियाएँ,परितापिकी क्रिया है !
१०-प्राणातिपाती की क्रिया-दुसरे जीव के शरीर,इन्द्रिय आदि प्राणों का ही घात करना,प्राणातिपाती की क्रिया है !
११-दर्शन क्रिया-राग के वशीभूत होकर मनोहर देखना,दर्शन क्रिया है!
१२-स्पर्शन क्रिया-रागवश किसी वस्तु को स्पर्श करना,स्पर्शन क्रिया है! 
१३-प्रात्ययिकी क्रिया-विषयों की नयी नयी वस्तुओं को एकत्र करना,प्रात्ययिकी क्रिया है!
१४-समन्तानुपात क्रिया-स्त्रीपुरुष, के सोने/बैठने के स्थान पर मलमूत्र आदि क्षेपण करना,समन्तानुपात क्रिया है !
१५-अनाभोग क्रिया-बिना देखी,बिना शोधी जमीन पर उठने बैठने को अनाभोग क्रिया कहते है !
१६-स्वहस्त क्रिया -दुसरे के योग्य कार्य स्वयं करना स्वहस्त क्रिया है!
१७-निसर्ग क्रिया-पाप की कारण प्रवृत्ति को भला समझने को निसर्ग क्रिया कहते है!
१८-विदारण क्रिया-पर द्वारा किये गए पापों को प्रकाशित करने को विदारण क्रिया कहते है !
१९-आज्ञाव्यापादिकी क्रिया-चारित्रमोहनीय के उदय से शास्त्रोक्त आवश्यकादि क्रियाओं के करने में असमर्थ होने पर उनका अन्यथा निरूपण करना, आज्ञाव्यापादिकी क्रिया कहते  है !
२०-अनाकांक्षा क्रिया-प्रमाद/अज्ञान वश,आगमोक्त क्रियाओं में अनादर करना अनाकांक्षा क्रिया है ! 
२१-आरंभिकी क्रिया -छेदन भेदनादि क्रियाओं में स्वयं प्रवृत्त होना,अन्यों को प्रवृत्त होता देख प्रसन्न होना आरंभिकी क्रिया है !
२२-परिग्रहिकीक्रिया-परिग्रहों की रक्षा में लगे रहना परिग्रहिकी क्रिया है !
२३-माया क्रिया-ज्ञान दर्शन में कपट रूप प्रवृत्ति करना माया क्रिया है !
२४-मिथ्यादर्शन क्रिया-मिथ्यात्व रूप परिणीति मे,किसी को मिथ्यात्व की प्रशंसा कर,दृढ करना मिथ्यादर्शन क्रिया है !
२५-अप्रत्याख्यान क्रिया-चारित्र मोहनीय के उदय से त्याज्य वस्तुओं में त्याग रूप प्रवृत्ति नहीं होना,अप्रत्याख्यान क्रिया है!
१२-३-१६ 
शंका-सभी आत्माओं के तीनो;मन,वचन और काय योग कार्य है,अत:सब  सैनी पंचेन्द्रिय संसारी जीव के समान रूप से प्राप्त होने के कारण;सभी को कर्म बंध के फल का अनुभव एक समान होना चाहिए !
समाधान-सब को एक समान कर्मबंध का फल नहीं मिलता क्योकि यद्यपि योग सभी सैनी पंचेन्द्रिय आत्मा  के होते है  किन्तु जीवों के परिणामों में तीव्रता /मन्दता अनन्त भेदों  सहित   होती है !इसलिए कर्म के फलों में भिन्नता आ जाती है! आचार्य श्री ने इसे  निम्न सूत्र द्वारा स्पष्ट किया है
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#2

मुनि श्री 108 प्रमाण सागर जी महाराज
तत्वार्थ सूत्र स्वाध्याय | अध्याय 6 | सूत्र 1 , 2, 3, 4 |
19 Sept.2020

Manish Jain Luhadia 
B.Arch (hons.), M.Plan
Email: manish@frontdesk.co.in
Tel: +91 141 6693948
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#3

क्षु. मनोहर वर्णी - मोक्षशास्त्र प्रवचन
कायवाङ्मनःकर्म योग: ।। 6-1 ।।

योगका लक्षण और सूत्रप्रयुक्त कर्म शब्द के अर्थ पर विचार―शरीर, वचन और मन का कर्म योग कहलाता है । इस सूत्र में दो पद हैं । प्रथम पद में समास इस प्रकार है कि कायश्च वाक्चमनश्च कायवाङ्मनांसि तेषांकर्मइति कायवाङ्मन: कर्म । यहां कर्म शब्द का अर्थ क्रिया है अर्थात् शरीर की क्रिया, मन की क्रिया, वचन की क्रिया, यद्यपि कर्मशब्द के अर्थ अनेक होते हैं । कहीं तो कर्मकारक में प्रयोग होता है, कहीं पुण्य पाप अर्थ लिया जाता है, कहीं क्रिया अर्थ लिया जाता है, । यहां क्रिया अर्थ है, अन्य अर्थ यहां घटित नहीं होते । कर्म शब्द का एक अर्थ कर्मकारक है, वह यहां इस कारण घटित नहीं होता कि शरीर वचन और मन यहां कर्म नहीं माने जा सकते, क्योंकि कर्म होते हैं तीन प्रकार के (1) निर्वर्त्य (2) विकार्य और ( 3) प्राप्य । निर्वर्त्यं कर्म उसे कहते हैं जो रचा जाये । जैसे लोहे की तलवार बनायी जा रही है तो यहां बनाने वाला लोहार है और वह तलवार को बनाता है तो वह तलवार किस तरह बनती है कि वह लोहा ही पसर फैलकर उस रूप में आ जाता है । तो यह रचना हुई लोहे की । तो कोई कर्म तो रचनारूप होते हैं, कोई कर्म विकार्य होते हैं जैसे सेठानी जी दूध से दही को बना रही हैं तो दही का बनाना क्या? दूध में जामन डालना और उसका विकार बन गया, उस विकार का नाम दही है । तो दही जो निष्पन्न हुआ है वह दूध का विकार रूप है । निर्वर्त्य में और विकार्य में अंतर क्या आया? निर्वर्त्य में विकार नहीं है लोहा था उसे पसारकर, आकार बदलकर एक रचना ही तो हुई पर विकार नहीं आया दही में विकार आया है । उसकी बदल बन गई है । रूप भी दूसरा, रस भी दूसरा, गंध भी दूसरा, स्पर्श, भी दूसरा हो गया । एक होता है प्राप्यकर्म जैसे देवदत्त स्टेशन को जाता है तो यहां स्टेशन कर्म है तो वह प्राप्य कर्म है, अर्थात् न तो स्टेशन निर्वर्त्य है कि देवदत्त ने किसी चीज से स्टेशन की रचना की और न वह विकार्य कर्म है कि कोई चीज मिलाकर किसी चीज का विकार बन गया हो स्टेशन किंतु वह प्राप्य कर्म है । देवदत्त दो मील दूर था । अब वहाँ से चलकर उसने स्टेशन को प्राप्त कर लिया तो यों होता है प्राप्यकर्म । तो यहां देखिये कि ये तीनों ही प्रकार के कर्म कर्ता से भिन्न हैं । पर यहां शरीर, मन, वचन के जो योग हैं वे कर्ता से भिन्न हैं क्या? अगर इन्हें कर्म मानते तो इससे भिन्न कर्ता क्या? तो ये कर्म कारक में नहीं आते । यहाँ एक बात विशेष जानना कि अध्यात्मशास्त्र में कर्ता कर्म आदिक का अभेद बताया जाता । उसकी दृष्टि और है । निश्चयनय की दृष्टि में एक ही पदार्थ में षट्कारक निरखना हुआ करता है । मगर रूढ़ि में, आमरिवाज में जो कर्ता कर्म की रूढ़ि है तो वह भिन्न-भिन्न में हुआ करती है । यहां स्थूल दृष्टि से चिंतन चल रहा है कि शरीर, वचन और मन ये कर्मकारक नहीं है । तो दूसरा कहा गया था कि ये पुण्य, पापरूप होंगे सो पुण्य पापरूप भी कर्म यहां नहीं माना, क्योंकि यदि इनका पुण्य पापरूप से अभिप्राय होता तो आगे सूत्र स्वयं कहा जायेगा―शुभपुण्यस्याशुभ: पापस्य यदि पुण्य पाप यहां प्रयुक्त कर्म का अर्थ माना जाता तो आगे इस पुण्य पाप का जिक्र क्यों करते, इससे पुण्य पाप वाला कर्म भी इस सूत्र में कहे गए कर्म शब्द का अर्थ नहीं है । तब फिर क्रिया ही अर्थ रहा । शरीर, वचन, और मन की क्रिया योग है अथवा कर्मकारकरूप से भी समझना हो तो कर्ता मानो आत्मा को और उसके कर्म हुए शरीर, वचन, मन, तो इस प्रकार कर्म लगाये जा सकते हैं, पर यहां मुख्यता क्रिया की है । यहाँ यह बात भी समझने योग्य है, योग परमार्थ से शरीर, वचन, मन की क्रिया नहीं है, किंतु शरीर, वचन, मन की क्रिया करने के लिए उस क्रिया के अभिमुख जो आत्मप्रदेशों का परिस्पंद है वह योग कहलाता है ।

(2) कर्म शब्द की निष्पत्ति व योग की त्रिविधता―कर्म शब्द की निष्पत्ति कैसे हुई है । तीनों साधनों में कर्म शब्द की निष्पत्ति हुई है । जैसे―आत्मा के द्वारा जो परिणाम किया जाता है वह कर्म है । तो ‘आत्मना क्रियते तत् कर्म’ यह कर्म साधन हो गया । 'आत्मा द्रव्य भावरूपं पुण्यं पापं करोति इति कर्म ।’ आत्मद्रव्य भावरूपं कर्म को करता है तो यह कर्तृसाधन हो गया । और जब ऐसी क्रिया पर ही दृष्टि हुई तो वह भाव साधन हो गया । 'करणं कृतिर्वा कर्म' निश्चय से तो आत्मा के द्वारा अत्मा का परिणाम ही किया जाता है, पर निमित्तनैमित्तिक भाव के कारण व्यवहारदृष्टि से आत्मा के द्वारा योग शब्द भी कर्ता, कर्म, करण साधन में प्रयुक्त होता है । यहाँ एक शंकाकार कहता है कि आत्मा तो अखंड द्रव्य है और तीनों प्रकार के योग आत्मा के परिणाम स्वरूप हैं । तो परमार्थदृष्टि से तो तीन भेद योग के न होना चाहिए । फिर यहां ये तीन भेद कैसे किए गए? उत्तर―पर्यायदृष्टि से ये व्यापार भिन्न-भिन्न हैं, इस कारण योग के तीन भेद हो गए । जैसे मानो आम्रफल का परिचय करना है तो आम तो एक पदार्थ है, उसमें भेद क्यों हों? लेकिन चक्षु इंद्रिय से देखने पर आम में रूप विदित होता है तो घ्राणइंद्रिय से परिचय करने पर आम में सुगंध परिचत होती है और रसना इंद्रिय से परिचय करने पर मीठा खट्टा, इस प्रकार परिचय होता है, और स्पर्शन इंद्रिय से परिचय करने पर कोमल, कठोर ऐसा कुछ अनुभव होता है । तो आम तो एक वस्तु है दृष्टांत के लिए, किंतु इंद्रिय के व्यापार के भेद से उसमें चार भेद जैसे विदित हो गए हैं इसी तरह पर्याय के भेद से योग में भी भेद समझ लेना चाहिए । तो यहाँ आम्रफल में तो चक्षुइंद्रिय आदिक के निमित्त से रूप रस आदिक पर्यायभेद सिद्ध हुए हैं, क्योंकि ग्रहण भेद से ग्राह्य भेद होता ही है । इस प्रकार आत्मा में पूर्वकृत कर्मोंदय के निमित्त से, क्षयोपशम आदिक के निमित्त से शक्तिभेद भी होता है और योगभेद भी होता है।

(3) योगों की निष्पत्ति का सहेतुक विधान―देखिये पुद्गल विपाकी शरीर नामकर्म के उदय से शरीरादिक मिले हैं तो वहाँ शरीर, वचन, मन की वर्गणा में से किसी वर्गणा के आलंबन होने पर और वीर्यांतराय के क्षयोपशम से और मतिज्ञानावरण के क्षयोपशम से जो अंतरंग में वचनलब्धि प्राप्त हुई है तक वचन के परिणमन के अभिमुख आत्मा का जो प्रदेश परिस्पंद है वह वचनयोग कहलाता है । इस प्रकार सीधे स्पष्ट जाने कि योग तो आत्मा का प्रदेश परिस्पंद है । वह योग यदि वचन के अभिमुख है, वचन व्यापार करने के लिए निमित्तभूत हो रहा है तो वह कहलाता है वचनयोग । पर वचनयोग होने के लिए प्रथम तो शरीर चाहिए ना, वह शरीर नामकर्म के उदय से मिल गया, फिर उसकी शक्ति चाहिए, सो वीर्यांतराय कर्म के क्षयोपशम से शक्ति मिल गई, फिर इतना ज्ञान चाहिए कि जिससे वह वचन बोल सके, तो मतिज्ञानावरण का क्षयोपशम मिल गया, ऐसी स्थिति में वचनवर्गणा का आलंबन होने पर जो आत्मा का प्रदेश परिस्पंद है उसे वचनयोग कहते हैं, इसी तरह मनोयोग भी वह आत्मा का प्रदेश परिस्पंद है जो मन के परिणाम के अभिमुख है इसमें भी क्या-क्या साधन हुआ करते हैं कि पहिले तो शरीर नामकर्म का उदय चाहिए ताकि शरीर मिला सो वह भी मिल गया और वीर्यांतराय कर्म का क्षयोपशम हुआ और मनोज्ञानावरण का क्षयोपशम हुआ, इस प्रकार जब मन की लब्धि प्राप्त हो जाती है वहाँ फिर अंतरंग बहिरंग कारण मिलने पर विचार के अभिमुख जो आत्मा के प्रदेश परिस्पंद होते हैं वह है, मनोयोग। इसी प्रकार काययोग भी जानना । इतने साधन तो सभी में चाहने पड़ते हैं शरीर नामकर्म का उदय, वीर्यांतराय का क्षयोपशम और इसके होने पर औदारिक आदिक जो 7 प्रकारकी कायवर्गणायें हैं उनमें से किसी वर्गणा का आलंबन लेकर जो आत्मप्रदेश का परिंपंद है वह काययोग है । योग प्राय: क्षयोपशम के होने पर होता है, किंतु सयोगकेवली के ज्ञानावरण व वीर्यांतराय के क्षय पर भी होता है । वह क्षयोपशम निमित्तक रहा तो केवली भगवान में क्षय निमित्तक योग रहा । यह क्षय निमित्तक तो है पर इसका अर्थ यह नहीं कि क्षय हो चुके तो सदैव योग बना ही रहे । जो क्रिया का परिणमन करे ऐसे आत्मा के कायवर्गणा वचनवर्गणा, मनोवर्गणाके आलंबन से जो प्रदेश परिस्पंद होता है वह सयोगकेवली के योग की रीति है, पर इसका आलंबन आगे नहीं चलता इसलिए 14 वें गुणस्थान में और सिद्ध भगवान में योग नहीं होते हैं ।

(4) योग की आत्मा से कथंचित् भेदाभेद का संदर्शन व योग का प्रकृतार्थ―यहाँ एक बात यह भी जान लेना कि योग और आत्मा में कथंचित् भिन्नपना है, कथंचित् अभिन्नपना है । अभिन्नपना है ऐसा समझने में तो कुछ कठिनाई नहीं है, आत्मा है और प्रदेश परिस्पंद हो रहा उसका । तो आत्मा से प्रदेश जुदा नहीं और प्रदेश परिस्पंद जो हो रहा उससे आत्मा जुदा नहीं, लेकिन लक्षण संज्ञा आदिक के कारण उनमें भेद भी माना जा सकता है । जैसे एक पुरुष पुजारी है, किसान है, व्यापारी है । तो है तो वही पुरुष, मगर संज्ञा लक्षण आदिक के भेद से वे भिन्न-भिन्न रूप में परखे जाते हैं । अतएव वे व्यापार इससे भिन्न भी हो गए । तो ऐसे ही आत्मद्रव्य की दृष्टि से तो एकपना ही है, आत्मा, व योग तीन नहीं, हो गया, मगर क्षयोपशम जुदा-जुदा है, शरीर पर्याय जुदा-जुदा है । उसकी दृष्टि से योग तीन प्रकार का हो गया । यहां योग शब्द का अर्थ है प्रदेश परिस्पंद । योग का अर्थ ध्यान न लेना । ध्यान का वर्णन आगे ध्यान के प्रकरण में होगा । वैसे योग शब्द दोनों का पर्यायवाची है । युज् धातु समाधि अर्थ में भी आती है, पर उसका वर्णन आगे किया जायेगा । यहां उसके आस्रव बताये जा रहे हैं तो ध्यान से कहीं आस्रव होता है? प्रदेश परिस्पंद से आस्रव होता है । तो यहां योग का मतलब शरीर, वचन, काय की क्रिया है । योग शब्द का अर्थ जोड़ भी होता है । जैसे बच्चों को सवाल दिया जाता है दो तीन संख्यावों की लाइन रख दी और कहा कि इनका योग करो याने समुदाय अर्थ में भी योग का नाम चलता है, पर यहाँ समुदाय अर्थ नहीं किया जा रहा है । समुदाय अर्थ तो प्रथम पद में ही आ गया कि शरीर, वचन और मन का कर्म तो कर्म शब्द सबके साथ लिया जायेगा । शरीरकर्म, वचनकर्म और मन कर्म । पर यहां योग शब्द का अर्थ प्रदेशपरिस्पंद ही है ।

(5) आस्रवकारणपना व कायादिक्रमरहस्य का संदर्शन―इस सूत्र का तात्पर्य यह हुआ कि नवीन कर्म का आस्रव योग का निमित्त पाकर होता है, आत्मा के प्रदेश में जो परिस्पंद है वह नवीन कर्म के आस्रव का कारण है । कार्माणवर्गणा में कर्मत्व का आ जाना यह आत्मा के प्रदेशपरिस्पंद के कारण होता, यहाँ तक एक साधारण बात रही, पर उस कार्माणवर्गणा में स्थिति और अनुभाग आ जाये तो वह होता है कषायके निमित्त से । यहां केवल आस्रव का प्रकरण है । तो जो आस्रव का सीधा निमित्त हैं उसका ही वर्णन किया जा रहा है । शरीर, वचन और मन ये तीनों अजीव पदार्थ हैं, पर जीव के साथ संबंध होने से वे जीवित कहलाते हैं । तो वहां दो पदार्थ पड़े हैं―जीव और ये काय आदि पुद्गल । तो उपादान की दृष्टि से देखा जाये तो शरीर, वचन, मन की क्रियायें उन पुद्गलों में ही होती हैं और आत्मा के प्रदेशपरिस्पंद रूप क्रियायें आत्मा में होती हैं, किंतु जो आत्मप्रदेशपरिस्पंद काय, वचन, मन में से जिसकी क्रिया के लिए हो रहा हो उसमें उसका नाम जोड़ा जाता है । तो आरोप होने से योग के तीन नाम हो जाते हैं―काययोग, वचनयोग और मनोयोग प्राय: करके योग के जहां नाम आते हैं तो उनका क्रम इस प्रकार रहता है मन, वचन, काय, किंतु यहाँ काय, वचन, मन इस क्रम से प्रयोग किया गया है तो इसमें यह बात ध्वनित होती है कि काय की क्रियाविशेष विदित होने वाली और और विशेष परिस्पंद वाली है । वचनकी क्रिया काय की क्रिया की अपेक्षा कुछ कम चेष्टा वाली और वचन की अपेक्षा मन की क्रिया परिस्पंद भीतर ही उससे भी सूक्ष्म ढंग से है । तो स्थूल और सूक्ष्म की अपेक्षा इस सूत्र में काय, वचन और मन इस क्रम का प्रयोग किया गया है । एक बात यह जाहिर होती है कि कोई काय चेष्टा बिना विचारे भी हो जाती है, पर उसकी अपेक्षा वचन की क्रिया बिना विचारे नहीं होती, कम होती है । वचन बोलने में काययोग की अपेक्षा विचार अधिक चलता है और मनोयोग में तो वह विचाररूप ही है । तीसरी बात लौकिक दृष्टि से काय से होने वाला अनर्थ सबसे बड़ा अनर्थ है, वचन से होने वाला अनर्थ उससे कम है और मन में ही कोई बात सोच ले तो उससे दूसरे का अनर्थ नहीं होता, वह कम अनर्थ है, पर सिद्धांत की दृष्टि से काययोग से अधिक अनर्थ वचनयोग में है, वचनयोग से अधिक अनर्थ मनोयोग में है । ऐसे अनेक रहस्यों को संकेत करने वाले इस सूत्र में यह बात कहना प्रारंभ किया है कि जीव के साथ कर्मों का आते रहना किस प्रकार होता है? उसमें सर्वप्रथम आस्रव होता, उस आस्रव का इस सूत्र में संकेत किया है ।
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#4

क्षु. मनोहर वर्णी - मोक्षशास्त्र प्रवचन 
स आस्रव: ।। 6-2 ।।

(6) आस्रव का स्वरूप―इससे पूर्व सूत्र में तीन प्रकार की क्रियावों को योग कहा गया है । वह योग ही आस्रव है, ऐसा बताने के लिए यह सूत्र कहा गया है कि वह जो मन, वचन, काय का कर्मरूप योग है सो आस्रव है । यहाँ यह जानना कि वास्तविक आस्रव तो प्रदेशपरिस्पंद मन, वचन, काय इनमें से जिसके अभिमुख हो रहा है, जिसके लिए प्रदेशपरिस्पंद हो रहा है उस उस नाम से उनकी क्रियावों को उपचार से योग कह देते हैं । प्रदेशपरिस्पंद आस्रव है, इसका भी अर्थ यह जानना चाहिए कि योग नवीन कार्माण, स्कंधों में कर्मत्व होने का निमित्तभूत है यों निमित्त में आस्रवपने का उपचार किया है, अथवा जीव के लिए देखें तो जीवास्रव में यही आस्रव है । जीव का स्वभाव है निष्क्रिय रहना, निस्तरंग प्रदेश परिस्पंद से रहित रहना, सो यह स्वभाव अभिभूत होकर क्रिया परिस्पंद जीव में हो रहा, इसलिए यह आस्रव जीवास्रव है ।

(7) षष्ठ अध्याय के प्रथम और द्वितीय सूत्र को एक सूत्र न बनाने का कारण―यहां एक शंकाकार कहता है कि पूर्व सूत्र को और इस सूत्र का एक मिला दिया जाये तो योग शब्द न कहना पड़ेगा व शब्द भी न कहना पड़ेगा और संधि होने से एक अक्षर और भी कम हो जायेगा । ऐसा करने पर सूत्ररूप होगा―'कायवांङ्मन कर्मास्रव:' और सूत्र का लघु होना विद्वानों के लिए शुद्धि और प्रसन्नता का कारण होता है । इसके समाधान में कहते हैं कि यदि ऐसा सूत्र बनाया जाता और वहाँ योग शब्द न आता तो लोग योग से अपरिचित रहते और फिर सीधा ही यह ही जानते कि काय, वचन, मन की क्रिया ही आस्रव है । निमित्तनैमित्तिक भाव और वास्तविक आस्रवभाव का परिचय नहीं रहता । तो योग शब्द आगम में प्रसिद्ध है और उसका अर्थ यहाँ न कहा हुआ हो जाता, जिससे अर्थ में भी बाधा आती और योग शब्द का कथन न रहने का दोष भी रहता । अब शंकाकार कहता है कि योग शब्द भी रख लिया जाये फिर भी दोनों सूत्रों को मिला देने से सः शब्द न रखना पड़ेगा तो भी लघु हो जायेगा । उस समय सूत्र का रूपक होगा 'कायवांङ्मन कर्मयोग: आस्रव:' । इस शंका के उत्तर में कहते हैं कि दोनों को एक मिला देने से समस्त योगों में आस्रवपना आ जायेगा । यद्यपि मिला देना भी शाब्दिक दृष्टि से ठीक बैठना है फिर भी न मिलाया तो यह पृथक्करण इस बात को सूचित तो करता है कि योग आस्रव के हेतु है, परंतु सर्व योगमें समान आस्रवपना नहीं है और स्थिति की दृष्टि से 13वें गुणस्थान में सयोगकेवली के केवली समुद्धात में बड़ा योग होने पर भी आस्रव नहीं होता । वीतराग आत्माओं के सांपरायिक आस्रव नहीं कहा गया और सांपरायिक आस्रव ही वास्तव में आस्रव है । ईर्पापथास्रव तो निष्फल है, उसका तो एक समय भी ठहरना नहीं होता । यद्यपि सयोगकेवली में सूक्ष्मकाययोग है और उसके निमित्त से जो आस्रव है वह अत्यंत अल्प है, स्थिति ऐसी है मगर दोनों सूत्रों को एक मिला देनेसे उनका भी आस्रवपना सिद्ध हो जाता ।

(8) सानुभाग व निरनुभाग आस्रव के हेतुभूत योग को जानने के लिये सूत्रपार्थक्य―और भी देखिये―वर्गणावों का आलंबन के निमित्त से योग होता है और उसे आस्रव कहा है, मगर जिस समय दंड आदिक समुद्धात होते हैं वे वर्गणावों के आलंबन के निमित्त से नहीं होते । इस कारण सयोगकेवली के आस्रवपना नहीं माना गया । अब शंकाकार कहता है कि सयोगकेवली गुणस्थान में दंडादिक समुद्धात होने पर अन्य आस्रव नहीं माने गए तो सर्वथा निर्बंध हो जायेंगे, निरास्रव हो जायेंगे, पर करणानुयोग में सयोगकेवली गुणस्थान तक अथवा 11वें, 12वें, 13वें तीनों वीतराग आत्मावों के ईर्यापथास्रव कहे गए हैं, अथवा प्रकृतिबंध, प्रदेशबंध नाम का बंध माना गया है तब तो यह आगम के विरुद्ध हो जायेगा । इसके समाधान में कहते हैं कि वहां जो भी आस्रव हो रहा, बंध हो रहा, स्थिति अनुभाग से रहित जो कार्माणवर्गणायें आ रहीं उसमें दंडादि योग निमित्त बंध नहीं है । तो क्या है? कार्माणवर्गणा के निमित्त से आत्मप्रदेश का परिस्संद है और तन्निमित्तक वहां बंध है सो भी स्थिति अनुभागरहित है । शंकाकार कहता है कि जैसे केवली भगवान के इंद्रिय होने पर भी इंद्रिय का व्यापार न होने से इंद्रियजंय बंध नहीं हो रहा है उसी प्रकार दंडादिक समुद्धात होने पर भी तन्निमित्तक बंध न होने से इसका आस्रवपना न हो सकेगा । तो पूर्वोक्त आपत्ति न आने से दोनों सूत्रों को एक बना देने पर भी तो कुछ हर्ज नहीं है । इसके उत्तर में कहते है कि भिन्न-भिन्न सूत्र बनाने में यह अर्थ निकलता है कि शरीर वचन और मन की वर्गणावों के आलंबन से जो प्रदेश परिस्पंद है वही योग है और वही आस्रव कहलाता है अर्थात् कोई ऐसा भी योग है कि जिस योग से आस्रव नहीं होता, यह बात सब ही तो शुद्ध बनेगी जब दो सूत्र भिन्न कहे जायेंगे । यह आस्रव में मुख्य सांपरायिक आस्रव लेना ।

(9) आस्रव शब्द का शब्दार्थ, निरुक्त्यर्थ व प्रकृतार्थ―अच्छा अब देखो आस्रव नाम क्यों रखा गया है कर्म में कर्मत्व आने को ? आस्रव कहते हैं किसी द्वार से चूकर निकलने को । जैसे किसी पर्वत में किसी स्थल पर चूकर पानी निकलता है तो ऐसे ही योग की नाली के द्वारा आत्मा के कर्म आते हैं, इस कारण वह योग आस्रव नाम से कहा जाता है जैसे कोई गीला कपड़ा वायु के द्वारा लायी गई धूल को अपने प्रदेशों में ग्रहण कर लेता है अर्थात् चारों ओर से चिपटा लेता है, ऐसे ही कषायरूपी जल से गीला यह आत्मा योगरूप वायु के द्वारा लायी गई कर्मधूल को अपने सर्व प्रदेशों से ग्रहण कर लेता है अथवा जैसे कोई गर्म लोहे का गोला पानी में डाल दिया जाये तो वह गोला चूंकि बहुत तेज लाल गर्म है सो वह चारों तरफ से पानी को खींच लेता है, ऐसे ही कषाय की महती अग्नि से संतप्त हुआ यह जीव योग से लाये गए कर्मों को सर्व प्रदेशों से ग्रहण कर लेता है और इस प्रकारके आस्रव होने में आत्मप्रदेश परिस्पंद साक्षात् निमित्त है और वह हुआ मन, वचन, काय के अभिमुख होकर, इस कारण यहां तीन योगों को आस्रव कहा गया है । अब यहां भी जिज्ञासा होती है कि कर्म दो प्रकार के माने गए है―(1) पुण्यकर्म और (2) पापकर्म । तो क्या वहां अविशेषता से वह योग आस्रवण का कारण है या कुछ उन दोनों में भेद है? अर्थात् पुण्यकर्म का आस्रव हो, पापकर्म का आस्रव हो, दोनों एक समान विधि से हैं अथवा इनमें कुछ अंतर है इसके उत्तर में सूत्र कहते हैं―
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#5

शुभ: पुण्यस्या शुभ: पापस्प ।। 6-3 ।।

(10) शुभयोग और अशुभयोग का स्वरूप, विश्लेषण एवं कार्य―शुभयोग पुण्य का आस्रव करता है और अल्पयोग पाप का आस्रव करता है । शुभयोग क्या होता हैं ? उत्तर―शुभपरिणामपूर्वक होने वाला योग शुभयोग कहलाता है । शुभयोग भी तीन प्रकारके हैं―(1) शुभकाययोग, (2) शुभ वचनयोग, (3) शुभ मनोयोग । और अशुभयोग भी तीनों ही प्रकार के हैं―(1) अशुभ काययोग, (2) अशुभ वचनयोग और (3) अशुभभनोयोग ।
शरीर से खोटी चेष्टायें होने को अशुभकाययोग कहते हैं । जैसे कोई जीवहिंसा की प्रवृत्ति करता है, चोरी, मैथुन आदिक प्रवृत्तियां करता है तो यह अशुभ काययोग है । कोई पुरुष झूठ बोलता है, कठोर वचन कहता है तो वह अशुभ वचनयोग है । कोई पुरुष विचार गंदे रखता है, किसी को मारने का विचार, किसी से ईर्ष्या करने का विचार, किसी से मात्सर्य रखने का विचार, तो वह अशुभ मनोयोग कहलाता है, ऐसे ही अशुभयोग अनंत प्रकार के होते हैं―अब शुभयोग सुनो―जीवदया, हिंसा से निवृत्ति का परिणाम, अचौर्यभाव, व्रह्मचर्यभाव ये सब शुभकाय
योग हैं । सच हितकारी परिमित बोलना शुमवचनयोग है । वीतराग प्रभुकी भक्ति, तपश्चरण की प्रीति, श्रुतशास्त्र का विनय आदिक विचार शुभमनोयोग कहलाते हैं । ये सब अव्ययसाय कहलाते हैं । अध्यवसाय के स्थान यद्यपि असंख्यात लोक प्रमाण है फिर भी अनंतानंत पुद्गलसे बंधे हुए जो कर्म हैं ज्ञानावरणादिक उनके क्षयोपशम के भेद से वे तीनों योग अनंत प्रकार के हो जाते हैं, क्योंकि जितना उनमें क्षयोपशम उदय आदिक पड़े हैं उतने ही
अननानंत प्रदेश वाले कर्मों का ग्रहण होता है और फिर जीव अनंतानंत हैं, उस दृष्टि से तीनों योग अनंत प्रकार के हो जाते है ।

(11) शुभयोग से विषय स्वरूप के विषय में चर्चा―यहां एक बात विशेष जानना कि जो शुभ अशुभ योग में शुभ अशुभपना है वह इस कारण से नहीं है कि जो शुभकर्म का कारणभूत योग हो वह अशुभयोग कहलाये, क्योंकि शुभयोग होने पर भी ज्ञानावरणादिक अशुभ कर्मों का बंध चलता रहता है । फिर शुभ अशुभपना किस प्रकार है? जिसमें सातावेदनीय आदिक पुण्य प्रकृतियों का विशेद आस्रव हो उसका निमित्तभूत योग शुभ है, पाप प्रकृतियों के आस्रव का निमित्तभूत योग अशुभ है । अथवा यहाँ यह अवधारण करना कि शुभ योग ही पुण्य का आस्रव करता है, इससे यह सिद्ध होगा कि कुछ शुभयोग होने पर भी पाप का आस्रव होता रहता है ।

(12) पाप और पुण्य के विषय में स्वरूप निरुक्ति, विश्लेषण आदिकी चर्चा―पुण्य शब्द की निरुक्ति है ‘पुनाति आत्मानं अथवा पूयते अनेन' इति पुण्यं जब कर्तुसाधन की विवक्षा हो तो उस स्वतंत्रता को विवक्षा में तो यह निरुक्ति हैं कि जो आत्मा की प्रीति उत्पन्न कराये, हर्ष उत्पन्न कराये वह पुण्य है और जब करणसाधन की विवक्षा हो, जिसकी रीति परतंत्रता की विधि का प्रयोग है तो वहां अर्थ होता है कि हर्षरूप होता है जिसके द्वारा वह पुण्य कहलाता है । वे पुण्य प्रकृतियां क्या हैं सो स्वयं इस ग्रंथ में आगे कहा जायेगा कि साता वेदनीय आदिक पुण्य प्रकृतियां हैं । पाप पुण्य का प्रतिपक्षी है और पाप शब्द की निरुक्ति इस प्रकार है 'यातिरक्षति आत्मानं शुभपरिणामात् इति पापं,' धातु के अर्थ की दृष्टि से अर्थ होता है कि जो आत्मा को शुभ परिणाम से बचाये उसे पाप कहते हैं अर्थात् शुभ परिणाम न होने दे, खोटे परिणाम रहें वह पाप है । पाप कर्म असातावेदनीय आदिक हैं सो आगे के अध्यायों में कहेंगे । यहाँ शंकाकार कहता है कि जैसे बेड़ी चाहे सोने की हो अथवा लोहे की हो, उस बेड़ी के प्रयोग से परतंत्रता होना यह इससे समान ही पाया जाता है तो फल तो बराबर ही रहा । पुण्य भी परतंत्रता का कारण रहा, पाप भी परतंत्रता का कारण रहा, क्योंकि पुण्यफल में भी संसार में ही रहना पड़ता, पाप के फल में भी संसार में रहना पड़ता, तो समान ही निमित्त बना रहा केवल कल्पना का भेद करना अच्छा नहीं । वास्तविकता पर ध्यान दें तो दोनों का निमित्तभूत जो योग है वह एक समान है । इस शंका के उत्तर में कहते हैं कि हां एक दृष्टि से ऐसा ठीक है मगर इष्ट और अनिष्ट का निमित्त होने से उन दोनों में भेद है । पुण्यकर्म तो इष्टगति जाति शरीर इंद्रियविषय आदिक का निर्माण करने वाला है और पापकर्म अनिष्ट गति जाति शरीर आदिक सभी अनिष्ट विषयों का रचने वाला है । यह उनमें भेद है, सो जो शुभ योग है वह तो पुण्य का आस्रव करता है और जो अशुभ योग है वह पाप का आस्रव करता है ।

(13) शुभ अशुभ योग व पुण्य पाप के सामर्थ्यों का संदर्शन―यहां शंकाकार कहता है कि जब शुभ परिणाम होते संते घातिया कर्मोंका बंध होता ही रहता है, तो यह विभाग करना गलत रहा कि शुभ परिणाम पुण्य के आस्रव का कारण है, लो शुभ परिणाम तो पाप का भी आस्रव कराता है । इस शंका के उत्तर में कहते हैं कि यह पुण्य पाप की जो चर्चा है वह अघातिया कर्म की दृष्टि से समझना । अघातिया कर्मों में जो पुण्य है उनमें आस्रव का कारण अशुभयोग है अथवा शुभयोग पुण्य का ही कारण है, यह निश्चय नहीं कर रहे, किंतु यह निश्चय करना कि शुभयोग ही पुण्य का कारण है, इससे यह भी बात आ गयी कि शुभयोग होते हुए भी घातिया कर्मों का, पाप कर्मों का आस्रव हो सकता है । शंकाकार पुन: कहता है कि यदि शुभ पाप का और अशुभ पुण्य का भी कारण होता है तो जो आगममें बताया है कि सब कर्मों का उत्कृष्ट स्थितिबंध उत्कृष्ट संक्लेश से बताया गया है और जघन्य स्थिति बंध मंद संक्लेश से बताया गया है । तो ये दोनों ही बातें जो आगम में कही है वे निरर्थक हो जायेंगी । इस शंका के उत्तर में कहते हैं कि इन दोनों सूत्रों का अर्थ यों देखें कि तीव्र सक्लेश से उत्कृष्ट स्थितिबंध और मंद संक्लेश से जघन्य स्थितिबंध जो बताया है सो अनुभाग बंध की अपेक्षा जानना, क्योंकि फल में मुख्य निमित्त अनुभाग बंध होता है । कितने ही कर्मपरमाणु बँध जायें और कितनी ही स्थिति बंध जायें, यदि उनमें अनुभाग विशेष नहीं है तो वह फल विशेष नहीं दे सकता । तो चारों प्रकारके बंधोंमें अनुभाग बंध बड़ा प्रबल बंध है । सो यह अर्थ लेना कि समस्त शुभ प्रकृतियों का उत्कृष्ट अनुभाग बंध उत्कृष्ट विशुद्ध परिणाम से होता है और समस्त अशुभ प्रकृतियों का उत्कृष्ट अनुभाग बंध तीव्र संक्लेश परिणाम से होता है और स्पष्ट बात फिर यह है कि जैसे लोक में कोई पुरुष बहुत तो उपकार करता है और कदाचित् थोड़ा अपकार भी कर दे तो लोग उसको उपकारक ही मानते हैं, ऐसे ही शुभयोग होने पर कुछ पापकर्म का बंध भी हो जाये तो चूंकि अधिक पुण्य का ही बंध है इस कारण उसे पुण्यबंध का ही कारण कहा जाता है । अब यहाँ एक जिज्ञासा होती है कि क्या ये आस्रव समस्त संसारी जीवों के समान फल देने के हेतुभूत हैं या कुछ विशेषता है? इसके समाधान में सूत्र कहते हैं―
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#6

सकषायाकषाययो: सांपरायिकेर्यापथयो: ।। 6-4 ।।

(14) आस्रव की द्विविधता का व आस्रव के स्वामी का वर्णन―कषायसहित जीवों के सांपरायिक आस्रव होते हैं और कषायरहित जीवके ईर्यापथास्रव होता है । चूंकि आस्रव के दो प्रकार के स्वामी हैं । इस अपेक्षा से आश्रय के दो भेद कहे गए हैं । यद्यपि आस्रव के स्वामी अनंत हैं । जितने जीव हैं उन सबमें परस्पर भेद भी हैं, तिस पर भी उन सब जीवों को एक दृष्टि से संक्षिप्त किया जाये तो दो प्रकारों में आते हैं । कोई कषायसहित है, कोई कषायरहित है, कषाय किसे कहते हैं? जो आत्मा को कसे उसे कषाय कहते हैं । 'कषति आत्मानं इति कषाय, क्रोध, मान, माया, लोभ ये चार परिणाम आत्मा का घात करते हैं, कसते है, इसे दु:खी कर डालते हैं । बेचैन हो जाते हैं आत्मा कषायों से ग्रस्त होकर । और फिर अगले भव में कुगति भी मिलती है सो आगे भी उसका फल भोगना पड़ता है । तो आत्मा को ये कषायें चोंटती हैं, घात करती हैं इस कारण इन्हें कषाय कहते हैं । अथवा कषायें दूध, गोंद आदिक की तरह कर्मों को चिपकाती हैं इसलिए वे कषाय कहलाती । जैसे बड़ आदिक के पेड़ से जो गाढ़ा दूध अथवा गोंद जैसा निकलता है वह दूसरे पदार्थों को चिपकाने में कारण है, ऐसे ही क्रोधादिक भाव भी आत्मा को कर्म से चिपकाने में कारण बन जाते हैं या आत्मा से कर्म को चिपकने में कारण बनते हैं, इस कारण कषाय की तरह होने को कषाय कहते हैं । जो इन कषायों से युक्त भाव हैं वे सकषाय कहलाते हैं । और जो कषायों से रहित है, जहां कषाये नहीं पायी जातीं वह अकषाय कहलाता है । तो कषायसहित जीवके सांपरायिक आस्रव है, कषायरहित जीव के ईर्यापथास्रव है ।

(15) सांपरायिक न ईर्यापथ आस्रव का निरुक्त्यर्थ भावार्थ स्वामित्व आदि विषयक चर्चा―सांपराय शब्दमें मूल शब्द है संपराय और उसकी व्युत्पत्ति है कि चारों ओर से कर्मोंके द्वारा आत्मा को पराभव होना सो सांपराय है । 'कर्मभि: समंतात आत्मनः पराभव: इति सांपराय:,' और यह सांपराय जिसका प्रयोजन हो, जिसका कार्य हो इस सांपराय के प्रयोजन वाला काम सांपरायिक कहलाता है । इन दोनों आस्रवों में सांपरायिक आस्रव कठिन है, कठोर है, संसार का बढ़ाने वाला है, संसार फल देने वाला है, सुख दुःख का कारण
है, किंतु ईर्यापथास्रव केवल आता है और तुरंत निकल जाता है, आत्मा में ठहरता नहीं है । ईर्यापथ शब्द में दो शब्द हैं―(1) ईर्या और (2) पथ । ईर्या नाम है योग की गतिका, ईरणं ईर्या अर्थात् आत्मप्रदेशपरिस्पंद होना इसे कहते हैं ईर्या, और ईर्या के द्वारसे जो कार्य होता है उसे कहते हैं ईर्यापथं । 'ईर्याद्वारं यस्य तत् ईर्यापथ' इस सूत्र में दो पद हैं और दोनों में द्वंद्व समास है और इसी कारण दोनों ही पद द्विवचन में हैं, जिनका विभक्ति अनुसार अर्थ है कि कषायसहित जीवके सांपरायिक कर्म का आस्रव होता है । कषायरहित जीव के ईर्यापथकर्म का आस्रव होता है । मिथ्यात्व गुणस्थान से लेकर सूक्ष्मसांपराय गुणस्थान तक इन 10 गुणस्थानों में कषाय का उदय रहता है । सो कषाय के उदय से सहित जो परिणाम है ऐसे परिणाम वाले जीव के योग के वश से कर्म आते हैं और वे गीले चमड़े में धूल लगने की तरह स्थिर हो जाते हैं वे सांपरायिक कर्म कहलाते हैं, और 11वें गुणस्थानसे लेकर 13वें गुणस्थान तक उपशांत कषाय, क्षीण कषाय और सयोगकेवली ये तीनों कषायरहित हैं, वीतराग हैं, किंतु योग का सद्भाव है तो इसके योग के वश से जो कर्म आते हैं सो आयें तो सही, पर कषाय न होने से बंध नहीं होता । जैसे सूखी भीत पर कोई लोंधा गिर जाये तो वह तुरंत ही अलग हो जाता है, चिपटता नहीं है, इसी प्रकार कषाय न होने से यह आत्मा सूखे की तरह है । वहां जो कर्म आते हैं वे डले की तरह तुरंत दूर हो जाते हैं, इसका नाम है ईर्यापथ।

(16) सकषाय अकषाय शब्दों के सूत्रोक्त अनुक्रम की मीमांसा―एक शंकाकार कहता है कि इस सूत्र में पहले पद में दो स्वामियों का वर्णन किया है―1―कषायसहित का और 2―कषायरहित का । तो इन दो स्वामियों के बीच प्रशंसनीय तो कषायरहित है, इस कारण कषायरहित शब्द पहले कहना चाहिए था फिर सकषाय शब्द बोलते । इस नीति का उल्लंघन क्यों किया गया? इसके उत्तर में कहते हैं कि बात तो यह सही है । अकषाय
आत्मा पवित्र है, पूज्य है और सकषाय आत्मा उससे निकृष्ट है, किंतु पहिले कुछ वर्णन सकषाय जीव के बारे में होना है । अकषाय जीव के बारे में क्या विशेष वर्णन होगा? वहां कर्म स्थिति को ही प्राप्त नहीं होते । तो बहुत वक्तव्यता होने से सकषाय शब्द को पहले रखा गया है और इस कारण सांपरायिक होता है सो दूसरे पद में प्रथम सांपरायिक शब्द रखना पड़ा है । यहां यह बात शिक्षा में आती है कि जीव यदि अपने स्वरूप की संभाल करे, पूर्वकृत कर्म का उदय होने पर कषाय की छाया आये भी तो भी ज्ञानदृष्टि के बल से वहां बंध अति अल्प होता है और जब कषाय का संस्कार ही न रहे, निमित्तभूत मोहनीय कर्म भी न रहे, उसका विपाक न आये तो छाया भी न पड़ेगी तो वहाँ फिर योगवश जो कर्म आयेंगे वे ईर्यापथ हैं । इस जीव का संसार में भ्रमण कराने वाला कषायभाव ही है । अब जिज्ञासा होती है कि जब सांपरायिक आस्रव पहला वक्तव्य है, इसके विषय में बहुत अधिक वर्णन किया जाना है तो उसके पहले भेद बतलावो कि सांपरायिक आस्रव के कितने भेद हैं । इसी जिज्ञासा की पूर्ति के लिए सूत्र कहते हैं ।

Manish Jain Luhadia 
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तत्वार्थ सूत्र (Tattvartha sutra)
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