तत्वार्थ सुत्र अध्याय ७ भाग ३
#1

सम्यग्दर्शन के अतिचार-

शंकाकांक्षा विचिकित्सान्यदृष्टि प्रशंसासंस्तवा:सम्यग्दृष्टेरतिचारा: !!२३!!
संधि विच्छेद -शंका+कांक्षा+विचिकित्सा+अन्यदृष्टि (प्रशंसा+संस्तवाSmile+सम्यग्दृष्टे  अतिचारा:
शब्दार्थ:-शंका,कांक्षा,विचिकित्सा,अन्यदृष्टि प्रशंसा,अन्यदृष्टि संस्तवन, सम्यग्दृष्टे-सम्यग्दर्शन  के , अतिचारा:-अतिचार हैं
अर्थ-शंका,कांक्षा,विचिकित्सा,अन्यदृष्टि प्रशंसा,अन्यदृष्टि संस्तवन (वचन से ),सम्यग्दर्शन  के ५ अतिचारा    हैं !
भावार्थ-उक्त सूत्र में सम्यग्दर्शन को दूषित करने वाले पांच अतिचार  बताये है
१-शंकातिचार-जिनेन्द्र भगवान द्वारा प्रतिपादित वचनों ;तत्वों ,नव पदार्थों,भेद विज्ञान इत्यादि के स्वरुप में कदाचित शंका करना,जैसे शास्त्रों में ऐसा लिखा तो है किन्तु जमता नहीं है अथवा अपनी आत्मा को अखंड,अ- विनाशी जानते हुए भी मृत्यु से भयभीत होना,इस प्रकार के परिणाम होना से,सम्यग्दर्शन में शंकातिचार है!
२-कांक्षातिचार-सांसारिक अथवा परलोक के विषयों की वांच्छा होना,जैसे; इन को हम त्यागते है किन्तु होते तो अच्छे ही है,इस प्रकार के परिणाम होने से सम्यग्दर्शन में कांक्षातिचार होता है !
३-विचिकित्सातिचार-विचिकित्सा अर्थ है घृणा रूप भाव होना-दुखी,दरिद्र,रोगी जीवों को देखकर अथवा जैन मुनिराज की वैय्याव्रती करते हुए उनके मुख से दुर्गन्ध आने पर अथवा उनके मलीन शरीर को देखकर ,घृणा का भाव उत्पन्न होना,सम्यग्दर्शन में विचिकित्सातिचार है !
४-अन्यदृष्टिप्रशंसातिचार-अन्य मतियों के धर्मावलम्बियों की हृदय से प्रशंसा करना जैसे;"कुछ भी कहिये ये लोग बड़े अच्छे होते है क्योकि अपने धर्म के बड़े पक्के होते है,हम लोग तो कच्चे होते है"!इस प्रकार के परिणाम होना सम्यग्दर्शन में अन्यदृष्टिप्रशंसातिचार है क्योकि अन्य मतियों के धर्म की  मन से अनोमोदना है! 
५-अन्यदृष्टिसंस्तवनातिचार-अन्य मतावलम्बियों के धर्म का,वचन से गुणगान करना वचन से अनुमोदना है!जैसे टी.वी पर बैठे बैठे अन्य मतियों के संत के आत्मा पर प्रवचन बड़े मनोयोग से सुनकर, अंत में  कहना कि यह भी तो आत्मा पर अच्छे प्रवचन देते है,यह  सम्यग्दर्शन में, मन वचन काय से अनुमोदना के कारण, अन्य दृष्टिप्रशंसा और अन्यदृष्टिसंस्तवनातिचार का एक साथ दृष्टांत है!
विशेष-
१-व्रतों में चार प्रकार के दोष लगते है !
१-अतिक्रमदोष-व्रतों के प्रति रूचि गिरना,मन की पवित्रता का गिरना,व्रतों के प्रति आदर भाव नहीं रहना, व्रतों में अतिक्रम दोष है !
२-व्यतिक्रमदोष-व्रतों में निर्धारित सीमाओं का उल्लंघन कर लेना,यद्यपि त्यागी वस्तु का अभी सेवन नहीं किया,व्रतों में व्यतिक्रम दोष है!
३-अतिचार दोष-यदा कदा त्यागी वस्तु का सेवन करने के बाद,पश्चाताप होना व्रतों में अतिचारदोष है
४-अनाचार दोष-व्रती को धारण किये हुए व्रतों की कोई चिंता ही नहीं,उनको छोड़ देना व्रतों में अनाचारदोष है !
 उद्धारहण के लिए-एक बैल अपनी दोनों ओर गेहूं के लहलहाते हुए खेतों के बीच पगडंडी पर चल रहा है!बैल को हांकते हुए किसान से,गेहूं की फसल पर मुह नहीं मारने का वायदा,बैल कर लेता है!अब पग डंडी पर चलते चलते बैल विचार करता है कि एक मुह यदि फसल पर मार दूँ तो अच्छा है किन्तु किसान ने उसे कसकर पकड़ रखा है,यहाँ बैल के मन की पवित्रता में दोष आने से यह अतिक्रम दोष है!बैल ने पगडंडी पर चलते चलते इधर उधर मुह बढ़ाया किन्तु किसान ने रस्सी खीच ली,बैलों का सीमा का उल्लंघन करना व्यतिक्रम दोष है!फिर चलते चलते  उसने  झपट्टा मारकर गेहूं की बालिया खाली,जिसके फलस्वरूप किसान ने उसके दो डंडे मारे,जिससे बैल के विचार आया कि मैं ऐसा नहीं करूँगा,यह अतिचार दोष है!इसमें उसे अपनी मर्यादा,जिसका उल्लंघन उसे नहीं करना है  का,पुन: ज्ञान हो गया!फिर उसे गुस्सा आता है,वह दौड़कर खेत में अपने वायदे को भूलकर घुस जाता है और बहुत सारे गेहूं खाता है,किसान ने उसे डंडे भी मारे किन्तु वह नहीं माना यह अनाचार दोष है!

इस दृष्टांत को गणितज्ञ भाषा में इस प्रकार समझा जा सकता है -अतिक्रम पर २५%,व्यतिक्रम पर २५%, अतिचार पर २५%,और अनाचार पर १००% अंक कट जाते है तथा १००% की पेनल्टी भी लग जाती है !
शंका अन्य मतियों के शास्त्रों का स्वाध्याय करना चाहिए या नहीं ?
समाधान-सर्व प्रथम  अपने जैन धर्म के शास्त्रों का स्वाध्याय कर ,उनमे दृढ श्रद्धान होने के पश्चात अन्य मतियों के शास्त्रों के गुण/दोष देखने के उद्देश्य से,उनके स्वाध्याय में कोई आपत्ति नहीं है,क्योकि यदि अपने धर्म के प्रति अपरिपक्व श्रद्धान,अल्प ज्ञेय अवस्था में है तब अन्य मतियों के शास्त्रों का स्वाध्याय करने से आपका श्रद्धान डगमगा सकता है!
शंका -क्या किसी भी शास्त्र जी का स्वाध्याय किया जा सकता है ?
समाधान ,नहीं,अपने जैन धर्म के भी,सत्यमहाव्रतधारी पूर्वाचार्यों द्वारा लिपिबद्ध सच्चे शास्त्रों का ही स्वाध्याय करना चाहिए क्योकि वर्तमान में अनेक शास्त्रों में मिलावट देखने में आती है अन्यथा तत्वार्थ का सच्चा ज्ञान नहीं हो पायेगा! वर्तमान के कुछ टीकाकारों ने,अपने मत की पुष्टि हेतु पूर्वाचार्य द्वारा लिपिबद्ध करी गई गाथाओं का अर्थ सही किया है किन्तु भावार्थ सर्वथा बदल कर अनर्थ कर दिया है!जैसे;एक तत्वार्थ सूत्र की टीका में दसवे अध्याय के सूत्र ८,"-धर्मास्तिकायभावात्" का भावार्थ है की धर्म द्रव्य के अभाव में आत्मा लोक के अंत से आगे नहीं जा सकती,किन्तु टीका कार ने इसका भावार्थ बदल कर कहा कि,आत्मा में सीमित शक्ति के कारण वह लोकांत से ऊपर, आगे नहीं जा सकती,जबकि आत्मा में तो अनंत शक्ति है!वे टीकाकार क्योकि निमित्त को नहीं मानते इसलिए,मात्र अपने मत की पुष्टि के लिए,उन्होंने उक्त सूत्र का भावार्थ स्वेच्छा से बदल दिया है,जो की मिथ्यात्व का पोशक है क्योकि आगम विरोध वचन है !
शंका-महिलाओं को ,अन्यमतियों में सुसराल होने पर उनके मंदिरों में जाना चाहिए या नहीं ?
समाधान-वास्तव में तो विवाह स्व धर्मावलम्बी परिवार में ही होना चाहिए जिससे अपने धर्म का  पालन पुत्री  विधिवत कर सके!वर्तमान में विवाह युवक एवं युवतियों की परिपक्व आयु में होता है उन्हें अपने  ससुरालियों  को धर्म के संबंध में अपने  मत को  पाणिग्रहण संस्कार से पूर्व  स्पष्ट बता देना चाहिए कि उन्हें अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता मिलेगी तथा देवी/देवताओं की पूजा नहीं करूंगी !यदि उन्हें विवाह  शर्तो  यह मंजूर है तब ही वे विवाह करें अन्यथा नहीं !आचर्य सामंत भद्र स्पष्ट  कहते है कि सम्यग्दृष्टि जीव किसी स्नेह,भय, आशा अथवा लोभ वश  कु देव  कु शास्त्र कु  गुरु की पूजा नहीं करता ,उसके पास अन्य मतावलम्बियों के मंदिरों आदि को देखने के लिए समय ही नहीं होता , सिर्फ अपने सच्चे देव शास्त्र गुरु को ही  पूजता है !
जिनकी शादी हो चुकी है,वे अपने ससुरालियों को  सच्चे मुनि/साधु के  पास लेजाकर उनके धर्म सम्बन्धी मत को ठीक करवाने का प्रयास करे !यदि नहीं ठीक करवा सके तो उन्हें अपने मत के  चलने दे और स्वयं अपने मतानुसार चले !

व्रत और शीलों के अतिचार-
व्रतशीलेषु पञ्चपञ्च यथाक्रमम् !!२४!!
संधि-विच्छेद-व्रत-शीलेषु+पांच पांच +यथा+ क्रमम्

अर्थ-पांच अणुव्रतों और सात शील व्रतों के पांच पांच अतिचार है जिनको कर्म से कहता हूँ  

अहिंसाणु व्रत के पांच अतिचार-
बन्ध वधच्छेदातिभाररोपणान्ना-पाननिरोधा:-!!२५!!
संधि विच्छेद-बन्ध+ वध+छेद+अतिभाररोपण+अनपाननिरोधा:!
शब्दार्थ:-बन्ध-बांधना,वध-मारना,छेद-छेदना,अतिभाररोपण-अधिक वजन लादना,अनपाननिरोधा:-समय पर भोजन जल नहीं देना !-
अर्थ -अहिंसा अणु व्रत के पांच अतिचार निम्न है -
१-बंध-प्राणी को सांकल अथवा पिंजरे में/ रस्सी से कसकर बाँधना !
२-वध-प्राणियों को कोड़े अथवा डंडे से मारना
३-छेदन- प्राणियों के नाक कान आदि अंगो का छेदन करना !
४-अतिभार्रोपण-प्राणियों से सामर्थ्य से अधिक कार्य करवाना/पशुओं पर अधिक भार लादना !
५ -अन्नपान निरोध-प्राणियों को समय पर जल /पानी नहीं देना या उन्हें लेने देना
अपने अहिंसाणुव्रत के अतिचार रहित पालन के लिए उपयुक्त नही करने चाहिए 
अपने अहिंसाणुव्रत के अतिचार रहित पालन के लिए उपयुक्त नही करने चाहिए
विशेष-सम्यग्दृष्टि जीव के प्रशम-मंद कषाय,संवेग-संसार के स्वरुप से भय,अनुकम्पा-अन्य प्राणियों के कष्टों को स्वयं अनुभव करते हुए उनका निवारण करने का उपाय करना और आस्तिकाय।चार प्रमुख गुण स्वभावत: होते है.उसकी लेश्या पीत ,शुक्ल और पदम होती है, अत;उसके परिणाम सरल होते है!फिर भी कदाचित इनके अभाव में उनके अणुव्रत में उक्त अतिचार लगते है !
श्रावकाचारों में स्पष्ट निर्देश है कि, पशुओं के पालन हेतु, उन्हें रस्सी न बाधके बड़े baadey में खुला रखना चाहिए !यदि बांधना ही आवश्यक हो तो उन्हें ढीली रस्सी से बंधे जिससे वे स्वतंत्रता पूर्वक घूम सके !
सत्याणुव्रत के अतिचार-
मिथ्योपदेशरहोभ्याख्यानकूटलेखनक्रियान्यासापहारसाकारमंत्रभेदा:!!२६!!

संधि विच्छेद -मिथ्योपदेश+रहोभ्याख्यान+कूटलेखनक्रिया+न्यासापहार+साकारमंत्र+भेदा:
शब्दार्थ-मिथ्योपदेश,रहोभ्याख्यान,कूटलेखनक्रिया,न्यासापहार ,साकारमंत्र,भेदा:-ये सत्यणुव्रत के अतिचार है !!
अर्थ-सत्याणुव्रत के मिथ्योपदेश,रहोभ्याख्यान-कूटलेखनक्रिया-न्यासापहार,साकारमंत्र पांच अतिचार है !
भावार्थ-
१-मिथ्योपदेश-आगम के विरुद्ध झूठे ,अकल्याणकारी उपदेश देना !
२-रहोभ्याख्यान-स्त्री पुरुषों की गुप्त बातों को जानकर सार्वजानिक प्रकाशित करना !
३-कूटलेखन क्रिया - झूठे दस्तवेज़ तैयार कर दूसरों को फ़साना अथवा उनसे मुकदा जीतना !
४-न्यासापहार- किसी की धरोहर को हड़पना जैसे कोई आपके पास सोने की ६ चूड़ी रखवा कर गया और लौटने पर उसे याद नहीं रहा ,उसने आपसे चार चूड़ी ही मांगी ,आपने उसे चार वापिस कर दी और २ हड़प ली !
५-साकारमंत्रभेद -किसी बात उसके इशारों आदि से जानकर सार्वजानिक कर देना
सत्याणुव्रती को उक्त अतिचारों से अपने व्रतों की रक्षा करनी चाहिए !
विशेष-
शंका-वकीलों को तो अपने प्रोफेशन में झूठ बोलना आवश्यक है वे तो सत्यणुव्रती नहीं हो सकते !
समाधान
 -ऐसा नहीं है की सभी केस में झूठ ही बोलना आवश्यक हो ,बैंक के केस अधिकांशत: सीधे सच्चे होते है ,फिर केस में हीन अधिक झूठ सच्च का परीक्षण कर चयनित किया जा सकता है !गांधी जी सच्चे केस लेते थे !श्री रमेश चाँद जैन जी ,सहारनपुर ,आज भी सच्चे सीधे केस लेते ,बड़े प्रतिष्ठित वकीलों में से है!न्यायधीशों के द्वारा भी सम्मानित प्रतिष्ठा रखते है !प्रैक्टिस भी उनकी टक्क्र में अन्य वकील शहर में नही है !
अचौर्याणुव्रत के पांच अतिचार -

स्तेनप्रयोग तदाहृतादानविरुद्धराज्यतिक्रमहीनाधिकमानोन्मान प्रतिरूपकव्यवहारा:!!२७!!
संधि विच्छेद-
स्तेनप्रयोग+ तदाहृतादान+विरुद्धराज्यतिक्रम+हीन+अधिक+मान+उन्मान+प्रतिरूपक+ व्यवहारा:
शब्दार्थ-स्तेन+प्रयोग-चोरी के लिए किसी को स्वयं अथवा किसी के द्वारा प्रेरित करना अथवा चोरी करते हुए की अनुमोदना  कर प्रोत्साहित करना,तदाहृतादान-किसी चोर को ,चोरी के लिए प्रेरित किया या करवाया या अनुमोदना करी। ऐसे चोर  से माल खरीदना अनाचार है,किन्तु किसी अन्य चोर  से चोरी का माल खरीदना अतिचार है! विरुद्धराज्यतिक्रम-राजा के द्वारा स्थापित नियमों के विरुद्ध टैक्सो की चोरी करना या एक  राज्य से दुसरे राज्य  को चोरी से,अधिक लाभार्जन के उद्देश्य से हस्तांतरित करना , हीन-कम ,अधिक-अधिक, मान-बाँट, उन्मान-तराजू  अधिक लाभार्जन के उद्देश्य से भिजन भिन्न बाँट और तराजू रखना,  प्रतिरूपक-शुद्ध माल में मिलावट, व्यवहारा:-करना!!
अर्थ:- स्तेनप्रयोग,तदाहृतादान ,विरुद्धराज्यतिक्रम, हीनाधिकमानोन्मान,प्रतिरूपकव्यवहारा,पांच अचौर्याणुव्रत के अतिचार है !
१-स्तेनप्रयोग-किसी को चोरी करने के लिए स्वयं या /किसी अन्य के द्वारा प्रेरित करना / चोरी करते हुए को अनुमोदना कर  प्रोत्साहित  करना,अचौर्याणुव्रत का स्तेनप्रयोग अतिचार है
२-तदाहृतादान-ऐसे चोर से चोरी का माल खरीदना जिसकी चोरी के लिए चोर को स्वयं अथवा किसी अन्य से प्रेरित नहीं करवाया हो/प्रोत्साहित न किया हो,अचौर्याणुव्रतों में तदाहृतादान अतिचार है!किन्तु यदि उसी चोर से माल खरीदे जिसे चोरी के लिए स्वयं/अन्यसेप्रेरित क्या हो /अनुमोदना करी हो तो व्रत में  अनाचार होता है !
 ३-विरुद्धराज्यतिक्रम-शासक के द्वारा स्थापित किये राज्य के नियमों के विरुद्ध; बिक्री कर,आयकर,उत्पाद कर ,गृह कर इत्यादि की चोरी करना,अथवा किसी   दुसरे राज्य में अधिक लाभ के उद्देश्य से बिक्री आदि करों की चोरी कर हस्तांतरित करना,बिजली आदि की चोरी करना,अचौर्याणुव्रतों में विरुद्धराजयतिक्रम अतिचार है !
४-हीनाधिकमानोन्मान-क्रय और विक्रय के वस्तु को तौलने के लिए भिन्न भिन्न बाँट और तराजू/मीटर , हीना धिक तौल/नापने के लिए रख,अधिक लाभ अर्जित करना,अचौर्याणुव्रत में  हीनाधिकमानोन्मान अतिचार है !
५-प्रतिरूपकव्यवहारा:-प्रतिरूपक गलत/स्थापित मानों के विपरीत  /बेईमानी का ,व्यवहारा:-व्यापर /उत्पाद में व्यवहार करना !,अधिक लाभार्जन के उदेश्य से महगी वस्तु में सस्ती वस्तु मिला कर बेचनाजैसे शुद्ध घी में डालडा घी मिलाना,सोने में अधिक खोट मिलाकर,जेवर बना कर,बेईमानी से अधिक लाभ अर्जित करना  , अचौर्याणुव्रतों में प्रतिरूपकव्यव हारा अतिचार है !
विशेष-
१- अतिचार और अनाचार में अंतर  है कि व्रतों में अतिचार दोष लगने पर प्रायश्चित संभव है,किन्तु वही अतिचार दुबारा दौहराने से प्रायश्चित कार्यकारी नहीं होता है,वही अतिचार,अनाचार में बदल जाता है अर्थात अणुव्रत सर्वथा भांग हो जाता है !
२-व्यापारियों की अधिकतर दलील रहती है कि व्यापारिक प्रतिस्पर्धा के कारण बिक्री कर/आयकर/उत्पाद कर /बिजली आदि सरकारी राजस्वों  की चोरी करना उनकी  मजबूरी है,उसके बिना जीविका अर्जित ही करना असंभव है !यह दलील बिलकुल अव्यवहारिक है क्योकि कोई शासन/सरकार आपको निर्देशित नहीं करती कि आप अपना माल बिना कर वसूले बेचे,अब यदि व्यापरी प्रतिस्पर्धा में 'विक्रयकर',क्रय व्यापारी से  नहीं वसूलते तो सरकार की कहाँ गलत है !
 दूसरी बात बहुत से व्यापारी अधिक लाभ के लोभवश,बिक्री कर वसूलते भी है तो राजस्व विभाग में जमा नहीं करते !सारांशत करों की चोरी का मूल कारण लोभ कषाय है !बहुत से व्यापार ऐसे है जिन के ऊपर कोई बिक्री करनहीं है जैसे कपड़े का व्यापार ,किन्तु उनके व्यापारी भी अपनी बिक्री सही नहीं दिखाते क्योकि आयकर का भी भुगतान करना होता है!आयकर वर्तमान में पूर्वकी अपेक्षा काफी  % कम रह  गया है ,इसलिए आयकर अवश्य देना चाहिये,यह हमारेऔर हमारे  देश के विकास  में काम आता है,सिर्फ सोच का अंतर है!इसका भुग तान करने से, हमे आध्यात्मिक लाभ भी मिलेगा  और शारीरिक शांति क रूप में मिलता है,हम अचौर्याणुव्रत का भली प्रकार पालन कर पाते है!हमे व्यापार में लाभ,लाभांतराय  कर्म के क्षयोपशम से होता है,न की चोरी या हेरा फेरी करने से ,किन्तु जब हम चोरी/बेईमानी(मिलावट)करते है तो पाप कर्म का अनुभाग बढ़ता है,पुण्य का घटता है ,इसलिए लाभांतराय का क्षयोपशम हो नहीं होता, जो की हमारे पुन: लाभ को कम करने में सहकारी होता है !सभी जीवों को अपने कर्मों का हिसाब किताब तो अंतत देना ही पड़ता है इसलिए ईमानदारी से ही व्यापार/नौकरी करनी चाहिए!जिससे नींद भी बढ़िया आएगी,बीमारी नहीं लगेगी,इस तरह बीमारी पर हनी वाला खर्च बचा कर,लाभ ही होगा !जब आप अपने शुद्ध लाभ की गणना की तुलना ईमानदारी से अर्जित लाभ और बेईमानी से अर्जित लाभ से करेंगे तो आपका शुद्ध लाभ ईमानदारी से करे गए व्यापार में अधिक आएगा !

ब्रह्मचर्याणुव्रत के ५ अतिचार-
परविवाहकरणेत्वरिकापरिगृहीतापरिगृहीतागमनानंगक्रीड़ाकामतीव्राभिनिवेशा:!!२८!!

संधि विच्छेद-परविवाह करण+इत्वरिका परिगृहीतागमन +इत्वरिकाअपरिगृहीतागमन+अनंगक्रीड़ा+काम तीव्राभिनिवेशा:!!
शब्दार्थ-परविवाहकरण-अपने /अपने आश्रितों  के अतिरिक्त लोगो का विवाह करवाना,इत्वरिका-बदनाम  परिगृहीता-विवाहिता के,गमन-आना जाना,इत्वरिका अपरिगृहीतागमन-बदनाम अविवाहित के आना जाना, अनंगक्रीड़ा काम-काम सेवन के अतिरिक्त अन्य अंगों से वासना पूर्ती करना,कामतीव्राभिनिवेशा:-काम वासना की तीव्र अभिलाषा होना !!
अर्थ- परविवाहकरण ,इत्वरिका परिगृहीता गमन,इत्वरिका अपरिगृहीतागमन  अनंगक्रीड़ा, कामतीव्राभिनिवेश  ब्रह्मचर्याणुव्रत के ५ अतिचार है!
भावार्थ
१-परविवाहकरण-अपने एएवं अपने आश्रितों के अतिरिक्त अन्यों का विवाह करवाना जैसे बहुत से लोगो का शौक रिश्ते करवाने का होता है,परविवाहकरण ब्रह्म्चर्याणुव्रत का अतिचार है क्योकि अनावश्यक रूप से   अब्रह्म पाप में निमित्त हो रहे है !पंडित लोगों को रात्रि में विवाह नहीं करवाने चाहिए अन्यथा उनके दिन में  विवाह  करवाने में आपत्ति नही है,क्योकि विवाह संस्कार भी आगम में उल्लेखित है !
 २-इत्वरिका परिगृहीता गमन-किसी बदचलन स्त्री/पुरष के घर आना जाना,इत्वरिकापरिगृहीता गमन, ब्रह्म्च र्याणुव्रत में अतिचार है !
३-इत्वरिका अपरिगृहीतागमन-बदनाम अविवाहिता स्त्री /पुरुषों के घर आना जाना,(इसमें अविवाहित युवा युवक/युवतियां भी सम्मलित है),इत्वरिका अपरिगृहीता गमन,ब्रह्म्चर्याणुव्रत में अतिचार है ! 
४-अनंगक्रीड़ा-काम सेवन के अंगों के अतिरिक्त अन्य अंगो से काम क्रीड़ा में लिप्त रहना,ब्रह्मचर्याणुव्रत में अनंगक्रीड़ा,  अतिचार है
५-कामतीव्राभिनिवेश-काम वासना की तीव्र अभिलाषा होना ,ब्रह्मचर्याणुव्रतों में कामतीव्राभिनिवेश अतिचार है ! ५०-५५ वर्ष की  बाद ब्रह्मचर्याणुव्रतों ले लेना चाहिए ,अष्टमी चतुर्दशी,अष्टाह्निका पर्व,दस लक्षण पर्व  में,तीर्थ यात्रा के दौरान संयमित होकर व्रत का पालन करना चाहिए !


परिग्रह परिमाणुव्रत के अतिचार 
क्षेत्रवास्तुहिरण्यसुवर्णधनधान्यदासीदासकुप्यप्रमाणातिक्रमा:!!२९!!
संधि विच्छेद-क्षेत्र+वास्तु +हिरण्य+सुवर्ण +धन+धान्य +दासी+दास +कुप्य+ प्रमाण+अतिक्रमा:!!
शब्दार्थ-क्षेत्र-खेत,वास्तु-मकान,हिरण्य-चांदी,सुवर्ण-सोने के सिक्के/मुद्रा  आदि,धन-पशु धन ,धान्य-अनाज, दासी-सेविका,दास-सेवक,कुप्य-कपड़े और बर्तन, प्रमाण -संख्या ,क्षेत्रफल अथवा तौल का  अतिक्रमा:-उल्लंघन करना ,!!
अर्थ-खेत-मकान,चांदी और स्वर्ण के सिक्कों,पशुधन-अनाज ,सेवेकिा -सेवक,वस्त्र एवं बर्तनों के,अणुव्रत धारण करते  समय निर्धारित करे प्रमाण की सीमा का उल्लंघन करना ,परिग्रह परिमाणुव्रत के  पांच अतिचार है !
भावार्थ- 
१-क्षेत्र -वास्तु प्रमाणातिक्रम अतिचार-जैसे मान लीजिये अणुव्रत लेते समय १ खेत और १ मकान रखने की व्रती सीमा निर्धारित करता है !कुछ समय पश्चात वह अपने और पड़ौसी के बीच दीवार को तोड़ कर १ ही खेत और मकान कर लेता है तो,यदयपि  उसने गिनती का उल्लंघन नहीं किया,किन्तु यह उसके अणुव्रत में अतिचार हो गा क्योकि उसने क्षेत्रफल की निर्धारित सीमा का उल्लंघन करा है तथा उसे संख्या १ का आभास है !यदि संख्या का भी आभास नहीं रहे तो अनाचार होजाता है एयर व्रत ही भंग हो जाएगा  !
२-हिरण्य सुवर्ण  प्रमाणातिक्रम अतिचार- व्रत धारण करते समय व्रती  १० लाख रूपये की मुद्रा का  निर्धारित करता है तो उसे जीवन पर्यन्त इतने ही रूपये रखने होंगे ,मुद्रास्फीर्ति के कारण इस सीमा का उल्लंघन करने की सोचने मात्र से व्रत का अतिचार होगा यदि उसने इस सीमा को ५० लाख कर दिया तो अनाचार होगा !सहारनपुर के पंडित रत्न चाँद जी मुख्त्यार ने जो प्रमाण निर्धारित किया था उसको महंगाई के अनुपात में  कम करते गए,यहाँ तक की आखिर में उन्हें किसी ने  बुलाना होता था, तो वही रिक्शा में उन्हें अपने साथ ले जाता था ! इस व्रती को मुद्रा स्फीर्ति के साथ साथ अपनी इच्छाओं का दमन करना है !
३-धन-धान्य प्रमाणाति क्रम अतिचार-व्रती ने २ गाय और २ भैंस रखने  का नियम लिया तो उसको ४ भैस अतः ४ गाय में परिवर्तित नहीं कर सकते अन्यथा व्रत का अतिचार होगा!अनाज का भी जितना नियम में निर्धारित किया उतना ही रखना आवश्यक है !
४-दासी-दास प्रमाणाति क्रम अतिचार-व्रती द्वारा व्रत के समय निर्धारित दासी-दास की संख्या का उल्लंघन करने के सोचने मात्र से व्रत में अतिचार हो जाएगा और यदि उल्लंघन कर  दिया तो अनाचार होगा !
५-कुप्य-प्रमाणाति क्रम अतिचार-अनु व्रत धारण करते समय जितने कपड़े एवं बर्तनों के रखने का नियम लिया उसे जीवन पर्यन्त निभाना होता है!परिस्थितियों के अनुसार नियम नही बदलते,व्रती को  परिस्थितियों के अनुसार अपने को बदलना होता है !!
विशेष-श्रावकाचारों में उल्लेखित है की यदि एक गाय गर्भवती हो जाती है तो जिस व्रती ने २ गाय रखने का नियम लिया है उसे १ को बेच देना चाहिए !इसी प्रकार दो कार रखने  वाले व्रती को ,यदि कार बदलने की इच्छा है तो नयी  कार का एडवांस देने से पूर्व एक कार को बेच देना चाहिए !ये परिग्रह परिमाण व्रत में ५० साड़ी रखने का नियम लिया है तो ५-१० साड़ी कम ही रखनी चाहिए।क्योकि यदाकदा भेंट मे भी मिलती रहती है,उनका समायोजन अपनी निर्धारित संख्या में कैसे हो पायेगा !यह ध्यान में रखने से इस व्रत का निर्दोष पालन हो सकेगा !
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तत्वार्थ सूत्र (Tattvartha sutra)
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अध्याय 2
अध्याय 3
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अध्याय 6
अध्याय 7
अध्याय 8
अध्याय 9
अध्याय 10

Manish Jain Luhadia 
B.Arch (hons.), M.Plan
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