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श्री जिन सहस्त्रनाम मन्त्रावली दशम अध्याय भाग १
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श्री जिन सहस्त्रनाम मन्त्रावली दशम अध्याय भाग १



९०१-ॐ ह्रीं अर्हं दिग्वाससे  नमः  -दिशा रूप वस्त्रों को धारण करने/दिगंबर रहने से ,

९०२-ॐ ह्रीं अर्हं वातरशनाय  नमः   -वायु रूप करधनों को धारण करने से,

९०३-ॐ ह्रीं अर्हं निर्ग्रन्थेशाय  नमः   -निर्ग्रन्थ मुनियों के स्वामी होने से,

९०४-ॐ ह्रीं अर्हं दिगम्बराय   नमः   -निर्वस्त्र होने से,

९०५-ॐ ह्रीं अर्हं निष्किंचनाय   नमः   -परिग्रह रहित होने से,

९०६-ॐ ह्रीं अर्हं निराशंसाय   नमः    -इच्छा रहित होने से,

९०७-ॐ ह्रीं अर्हं ज्ञानचक्षुषे  नमः   -ज्ञानरूपी नेत्रों के धारक होने से ,

९०८-ॐ ह्रीं अर्हं अमोमुहाय  नमः   -मोहरहित होने से ,

९०९-ॐ ह्रीं अर्हं तेजोराशाय  नमः   -तेज के समूह होने से,

९१०-ॐ ह्रीं अर्हं अनन्तौजसे  नमः   -अनंत प्रताप के धारक होने से,

९११-ॐ ह्रीं अर्हं ज्ञानाब्धये  नमः   -ज्ञान के सागर होने से,

९१२-ॐ ह्रीं अर्हं शीलसागराय  नमः   -शील के सागर होने से,


९१३-ॐ ह्रीं अर्हं तेजोमयाय   नमः   -तेज का समूह होने से,


९१४-ॐ ह्रीं अर्हं अमितज्योतिषे  नमः   -अपरिमित ज्योति के धारक होने से,


९१५-ॐ ह्रीं अर्हं ज्योतिर्मूर्तये  नमः   -भास्वर शरीर होने से,


९१६-ॐ ह्रीं अर्हं तमोपहाय  नमः  -अज्ञानता रूप अन्धकार को नष्ट करने से,


९१७-ॐ ह्रीं अर्हं जगच्चूड़ामणये  नमः   -तीनों लोक के मस्तक पर रत्न के समान अतिशय ,श्रेष्ठ होने से,


९१८-ॐ ह्रीं अर्हं दीप्ताय नमः   -देदीप्यमान होने से,


९१९- ॐ ह्रीं अर्हं  शंवते  नमः  -सुखी/शांत होने से,


९२०-ॐ ह्रीं अर्हं विघ्नविनायकाय  नमः   -विघ्नों के नाशक होने से,


९२१-ॐ ह्रीं अर्हं कलिघ्नाय  नमः   -क्लेशों/पापो के नाशक होने

९२२-ॐ ह्रीं अर्हं कर्मशत्रुघ्नाय  नमः   -कर्म शत्रुओं के घातक होने से,

९२३-ॐ ह्रीं अर्हं लोकलोकप्रकाशकाय नमः   -लोक और अलोक को प्रकाशित करने से,


९२४-ॐ ह्रीं अर्हं अनिन्द्रालवे  नमः   -निंद्रा रहित होने से,


९२५-ॐ ह्रीं अर्हं तन्द्रालवे  नमः   -आलस्य/प्रमाद रहित होने से

९२६-ॐ ह्रीं अर्हं जागरूकाय  नमः -सदा जागृत रहने से,रहने से,

९२७-ॐ ह्रीं अर्हं प्रभामयाय  नमः   -ज्ञानमय होने,से

९२८-ॐ ह्रीं अर्हं लक्ष्मीपतये  नमः   -अनन्त चतुष्टाय रूप लक्ष्मी के स्वामी होने से,

९२९-ॐ ह्रीं अर्हं जगज्ज्योतिषे  नमः   -जगत को प्रकाशित करने से,


९३०- ॐ ह्रीं अर्हं धर्मराजाय नमः  - धर्महोने ,राज-अहिंसा धर्म के राजा होने से,


९३१-ॐ ह्रीं अर्हं प्रजाहिताय   नमः   -प्रजा के हितैषी होने से,


९३२-ॐ ह्रीं अर्हं मुमुक्षुवे  नमः   -मोक्ष के इच्छुक होने से,


९३३-ॐ ह्रीं अर्हं बंध मोक्षज्ञाय  नमः   -बंध और मोक्ष के स्वरुप के ज्ञाता होने से,


९३४-ॐ ह्रीं अर्हं जिताक्षाय  नमः   -इन्द्रियों को जीतने से,


९३५-ॐ ह्रीं अर्हं जितमन्मथाय  नमः   -काम पर विजेता होने से,


९३६-ॐ ह्रीं अर्हं प्रशांतरसशैलूषाय  नमः  -अत्यंत शान्तरूपी रस प्रदर्शित करने के लिए नट के समान होने से,


९३७-ॐ ह्रीं अर्हं भवयपेटकनायकाय  नमः   -भव्य जीवों के समूह के स्वामी होने से,


९३८- ॐ ह्रीं अर्हं मूलकत्रै नमः  -धर्म के आद्य वकता होने से,


९३९-ॐ ह्रीं अर्हं अखिलज्योतिषे  नमः   -पदार्थों को प्रकाशित करने से,


९४०-ॐ ह्रीं अर्हं मलघ्नाय  नमः -कर्ममल नष्ट करने से,


९४१-ॐ ह्रीं अर्हं मूलकारणाय  नमः -मोक्षमार्ग के मुख्य कारण होने से,


९४२-ॐ ह्रीं अर्हं आप्ताय  नमः -यथार्थ वक्ता होने से,


९४३-ॐ ह्रीं अर्हं वागीशवराय  नमः -वचनो के स्वामी होने से,


९४४-ॐ ह्रीं अर्हं श्रेयसे  नमः   -कल्याणरूप होने से,


९४५-ॐ ह्रीं अर्हं श्रायसोक्तये  नमः   -कल्याण रूप वाणी के होने से,


९४६-ॐ ह्रीं अर्हं निरुक्त्तवाचे  नमः   -सार्थक वचन होने से,


९४७-ॐ ह्रीं अर्हं प्रवक्त्रे  नमः   -श्रेष्ठ वक्ता होने से,


९४८-ॐ ह्रीं अर्हं वचसामीशाय  नमः   -वचनों के स्वामी होने से,


९४९-ॐ ह्रीं अर्हं मारजिते  नमः   -कामदेव को जीतने से,


९५०-ॐ ह्रीं अर्हं विष्वभावविदे  नमः   -संसार के समस्त पदार्थों के ज्ञाता होने से,
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