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श्री जिन सहस्त्रनाम मन्त्रावली दशम अध्याय भाग २
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श्री जिन सहस्त्रनाम मन्त्रावली दशम अध्याय भाग २



९५१-ॐ ह्रीं अर्हं सुतनवे   नमः   -उत्तम शरीर के धारक होने से,

९५२-ॐ ह्रीं अर्हं तनुनिर्मुक्ताय   नमः   -शीघ्र ही शरीर बंधन से रहित होकर मोक्ष प्राप्त करने से करने से,


९५३- ॐ ह्रीं अर्हं सुगताय  नमः   -प्रशस्त विहायोगगति केउदय में,आकाश में उत्तम गमन करने से/आत्मस्वरूप में तल्लीन रहने से /उत्तमज्ञानमय होने से,


९५४-ॐ ह्रीं अर्हं हतदुर्नयाय  नमः   -मिथ्यानयों को नष्ट करने से,


९५५-ॐ ह्रीं अर्हं श्रीशाय  नमः   -लक्ष्मी के ईश्वर होने से,


९५६-ॐ ह्रीं अर्हं श्रीश्रितपादाब्जाय  नमः   -लक्ष्मी द्वारा चरणो की सेवा होने से,:


९५७-ॐ ह्रीं अर्हं वीतये  नमः   -भयरहित होने से,


९५८-ॐ ह्रीं अर्हं अभयंकराय  नमः   -दूसरों के भय को नष्ट करने वाले होने से,: 


९५९- ॐ ह्रीं अर्हंउत्सन्नदोषाय  नमः   -समस्त दोषों रहित होने से,


९६०-ॐ ह्रीं अर्हं निर्विघ्नाय   नमः    -समस्त विघ्नो से रहित

९६१-ॐ ह्रीं अर्हं निश्चलाय  नमः   -स्थिर होने से,

९६२-ॐ ह्रीं अर्हं लोक वत्सलाय  नमः -  लोगो के स्नेह पात्र होने से,

९६३-ॐ ह्रीं अर्हं लोकोत्तराय  नमः   -समस्त लोक में उत्कृष्टतम होने से,


९६४-ॐ ह्रीं अर्हं लोकपतये  नमः   -तीनों लोक स्वामी होने से,


९६५-ॐ ह्रीं अर्हं लोकचक्षुषे  नमः   -समस्त लोगो के नेत्रस्वरूप होने से,


९६६-ॐ ह्रीं अर्हं अपारधिये  नमः   -असीमित बुद्धि के धारक होने से,


९६७-ॐ ह्रीं अर्हं धीरधि ये नमः -सदा स्थिर बुद्धि के धारक होने से,


९६८-ॐ ह्रीं अर्हं बुद्धसन्मार्गाय नमः  -समीचीन मार्ग के ज्ञाता होने से,


९६९- ॐ ह्रीं अर्हं शुद्धाय  नमः -कर्ममल रहित होने से,


९७०-ॐ ह्रीं अर्हं सत्यसूनृतपूतवाचे  नमः   -सत्य एवं पवित्र वचन बोलने से,


९७१-ॐ ह्रीं अर्हं प्रज्ञापारमिताय  नमः   -बुद्धि की पराकाष्ठा प्राप्त करने से,


९७२- ॐ ह्रीं अर्हं प्राज्ञाय  नमः -अतिशय बुद्धिमा न होने से,


९७३-ॐ ह्रीं अर्हं यतिविषये  नमः  - कषायों से उपरत होने से,


९७४-ॐ ह्रीं अर्हं नियमितेन्द्रियाय  नमः   - इन्द्रियों को वश में करने से,


९७५- ॐ ह्रीं अर्हं भदन्ताय  नमः   -पूज्य होने से,


९७६-ॐ ह्रीं अर्हं भद्रकृते  नमः   -सब जीवों का भला करने से,


९७७-ॐ ह्रीं अर्हं भद्राय  नमः   -कल्याणरूप होने से,


९७८-ॐ ह्रीं अर्हं कल्पवृक्षाय  नमः   -मन वांच्छित वस्तुओं के दाता होने से,


९७९-ॐ ह्रीं अर्हं वरप्रदाय  नमः   -इच्छित वर प्रदाता होने से,


९८०-ॐ ह्रीं अर्हं समुन्मूलितकर्मारये  नमः   -कर्म शत्रुओं को मूल से उखाड़ फेंकने से,


९८१-ॐ ह्रीं अर्हं कर्मकाष्ठाशुशुक्षणये  नमः   -कर्म रूप ईंधन को जलाने के लिए अग्नि के समान होने से,


९८२-ॐ ह्रीं अर्हं कर्मण्याय  नमः  - कार्यों को करने में निपुण होने से,


९८३- ॐ ह्रीं अर्हं कर्मठाय  नमः   -समर्थ होने से,


९८४-ॐ ह्रीं अर्हं प्रांशवे  नमः   -उत्कृष्ट /उन्नत होने से,


९८५-ॐ ह्रीं अर्हं हेयादेयविचक्षणाय  नमः   -हेय और उपादय पदार्थों के विद्वान ज्ञाता होने से,


९८६-ॐ ह्रीं अर्हं अनन्तशक्तये  नमः   -अनन्तशक्तियों के धारक होने से

९८७-ॐ ह्रीं अर्हं अच्छेद्याय  नमः   -किसी के द्वारा भी छिन्न भिन्न करने योग्य नही होने से,

९८८-ॐ ह्रीं अर्हं त्रिपुरारये  नमः   -जन्म,जरा,एवं मरण ,तीनों का नाश करने से,


९८९-ॐ ह्रीं अर्हं त्रिलोचनाय  नमः   -त्रिकालवर्ती पदार्थों के ज्ञाता होने से,


९९०-ॐ ह्रीं अर्हं त्रिनेत्राय  नमः   -त्रिकालवर्ती पदार्थों के ज्ञाता होने से,


९९१-ॐ ह्रीं अर्हं त्रयंबकाय नमः -त्रिकालवर्ती पदार्थों के ज्ञाता होने से,


९९२-ॐ ह्रीं अर्हं त्रयक्षाय  नमः   -त्रिकालवर्ती पदार्थों के ज्ञाता होने से,


९९३-ॐ ह्रीं अर्हं केवलज्ञानविक्षणाय  नमः  -केवल ज्ञान रुपी नेत्रों सहित त्रिकालवर्ती पदार्थों के ज्ञाता होने से,,


९९४-ॐ ह्रीं अर्हं  समन्तभद्राय   नमः -सब ओर मंगलरूप होने से,


९९५-ॐ ह्रीं अर्हं  शांतारये  नमः  -कर्मरूप शत्रुओं के शांत होने से,


९९६-ॐ ह्रीं अर्हं धर्माचार्याय  नमः  -धर्म व्यवस्थापक होने से,


९९७-ॐ ह्रीं अर्हं दयानिधये  नमः  -दया के भंडार के भंडार होने से

९९८- ॐ ह्रीं अर्हं सूक्ष्मदर्शिने  नमः   -सूक्ष्म पदार्थों को देखने से,

९९९-ॐ ह्रीं अर्हं जितानङ्गाय  नमः   -काम देव को जीतने से,


१०००-ॐ ह्रीं अर्हं कृपालवे  नमः   -कृपयुक्त होने से,


१००१-ॐ ह्रीं अर्हं धर्मदेशकाय  नमः   -धर्म के उपदेशकहोने से,


१००२-ॐ ह्रीं अर्हं शुभंयवे  नमः   -शुभयुक्त होने से,


१००३-ॐ ह्रीं अर्हं सुखसाद्भूताय  नमः   -सुख के आधीनहोने से,,


१००४-ॐ ह्रीं अर्हं पुण्यराशये  नमः   - पुण्य के समूह होने से,


१००५-ॐ ह्रीं अर्हं अनामयाय  नमः   -रोगरहित होने से,,


१००६-ॐ ह्रीं अर्हं धर्मपालाय   नमः   -धर्म के रक्षक होने से,


१००७-ॐ ह्रीं अर्हं जगत्पालाय  नमः   -जगत के रक्षक होने से,,


१००८-ॐ ह्रीं अर्हं धर्मसाम्राज्यनायकाय  नमः   -धर्मरूपी साम्राज्य से कहलाते है!
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