दसलक्षण मण्डल विधान
#1

दसलक्षण मण्डल विधान 
पं. टेक चंद जी

कवि श्री टेकचन्दजी कृत - श्री दशलक्षण मण्डल विधान

जोगी रासा

नेमीनाथो, देतो साथो, भव भव और न चाहूँ। भक्ति तिहारी, निशदिन मन वच, काय लाय करि गाऊं ॥ धर्म कह्यो तुम, वानी दश विधि, सो मोहि होउ सहाई। करुणासागर, स..रस गर्भित, शीश नमो थुति गाई ।

गीता छन्द

धर्मके दश कहे लक्षण, तिन थकी जिय सुख लहै। भवरोगको यह महा औषधि, मरण जामन दुख दहै ॥ यह वरत नीका मीत जीका, करो आदरतें सही। मैं जजों दश विधि धर्मके अंग, तासु फल है शिवमही ॥

पद्धड़ी छन्द

यह धर्म भवोदधि नाव जान, या सेयें भव दुख होइ हान यह धर्म कल्पतरु सुक्ख पूर, मैं पूजों भव दुख करन दूर ॥ मैं

गीता छन्द

यह वरत मन कपि गले माहीं, सांकली सम जानिये। गज-अक्ष जीतन सिंह जैसो, मोहतम रवि मानिये ॥

सुरथान' माहीं वरत नाहीं, मनुज हूँ शुभ कुल लहँ।

तातै सुअवसर है भलो, अब करौ पूजा धुनि कहै ॥ बेसरी छन्द

जाने दशलक्षण व्रत कीना, से सत्पुरुषनिमें परवीना। भवसागर फिरनो मिट जावै, जो नर दशलक्षण वृष' भावै ॥

भुजंगप्रयात छन्द

यही धर्म सारं करै पाप क्षारं, यही धर्म सारं, करै सुख अपारं। यही धर्म धीरा, हरै लोक पीरा, यही धर्म मीरा करै लोकतीरा ।

त्रिभंगी छन्द

यह धर्म हमारा, सब जग प्यारा, जगत उधारा हितदानी। यह दशविधि गाया, जन मन भाया, उच्च बताया जिनवानी ॥ यह शिव करतारा, अघतैं न्यारा, भवि उद्धारा मुनि धारा। ताकौ मैं ध्याऊं शीश नवाऊं, अर्घ चढ़ाऊं सुखकारा ॥

चौपाई छन्द

या व्रतकी महिमा कहि वीर, दशविधि धर्म हरै भवपीर। इसी धर्म बिन जग भरमाय, जजहु धरम अति दुरलभ पाय॥ दोहा-दश प्रकारको धर्म यह, दशविधि सुरतरु जान।

वांछित पद सेवक लहैं, अधिक कहा सुखदान ॥ सोरठा-धर्म हमारा नाथ, धर्म जगतका सेहरा। भव भवमें हो साथ, और न वांछा मन विषै ॥

मण्डल मध्ये पुष्पांजलि क्षिपेत् ।


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