भव्य और अभव्य
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*भव्य और अभव्य!*
जो पाप बंधन से डरे~वह भव्य,और जो नहीं डरे~अभव्य
जो मोक्षाभिलाषी है वह भव्य,जो नहीं वह अभव्य।
सर्वज्ञता को स्वीकारे वह भव्य,नहीं माने वह अभव्य।
जो आत्मा के स्वरुप को जान सके भव्य और जो नहीं जान सके अभव्य।
आत्मा और पुदगल का भेद विज्ञान जिसे हो वह भव्य,जिसे न हो वह अभव्य।
भव्य के ५ ज्ञान,३अज्ञान सत्ता में होते है,अभव्य के ३ अज्ञान ही होते है।
भव्य १४ पूर्वों का ज्ञाता हो सकता है,अभव्य मात्र नौवे पूर की तीसरी आचार वस्तु तक द्रव्यतः जान सकता है।
भव्य में मोक्ष प्राप्ति की योग्यता होती है,अभव्य में नहीं।
भव्य समकित प्राप्त नहीं करता है,तब तक मिथ्यात्वी रहता है किंतु अभव्य सदैव मिथ्यात्वी ही रहता है।
भव्य को भव भ्रमण से भय लगता है,अभव्य को नहीं।
भव्य के अहिंसात्मक भाव होते है,अभव्य जे हिंसात्मक भाव होते है।
भव्य में सत्य श्रद्धान है, अभव्य में नहीं।
भव्य को आत्म-विश्वास होता है,अभव्य को नहीं।

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