10-04-2026, 04:01 AM
*सम्यग्दृष्टि श्रावक के 77 गुण!*
आचार्य कुन्दकुन्द देव रचित रयणसार ग्रन्थ के अंतर्गत सम्यग्दृष्टि श्रावक के 77 गुणों का वर्णन आता है।इन 77 गुणों को मुख्य रूप से 8 वर्गों में विभाजित किया गया है,जो श्रावक के आत्मिक और व्यावहारिक जीवन को शुद्ध बनाते हैं।इन सभी अंगों और दोष-त्याग का सविस्तार वर्गीकरण नीचे दिया गया है।
{1}
आठ मूलगुण~श्रावक के जीवन की आधारशिला ये आठ मूलगुण हैं।इनका पालन हर गृहस्थ के लिए अनिवार्य है
मद्य त्याग~शराब या किसी भी नशीले पदार्थ का त्याग।
मांस त्याग~जीव हिंसा से जनित मांस का सर्वथा त्याग।
मधु (शहद)त्याग~त्रस जीवों की उत्पत्ति के कारण शहद का त्याग।
पाँच उदुम्बर फलों का त्याग~बड़,पीपल,पाकर, गूलर और कठूमर (इनमें अनंत त्रस जीव होते हैं)का त्याग।
{2}
बारह उत्तरगुण~इन्हें श्रावक के बारह व्रत भी कहा जाता है,जो श्रावक के चरित्र को दृढ़ करते हैं
पाँच अणुव्रत~स्थूल अहिंसा, स्थूल सत्य,स्थूल अचौर्य(चोरी न करना),स्थूल ब्रह्मचर्य (स्वदारसंतोष),और स्थूल अपरिग्रह(इच्छा परिमाण)।
तीन गुणव्रत~दिग्व्रत (दिशाओं की सीमा),देशव्रत (क्षेत्र की सीमा),और अनर्थदण्डव्रत(प्रयोजनहीन पापों का त्याग)
चार शिक्षाव्रत~सामायिक (समता भाव),प्रोषधोपवास (अष्टमी-चतुर्दशी को उपवास),भोगोपभोग परिमाण (भोग की वस्तुओं को सीमित करना)और अतिथि संविभाग (मुनिराज या व्रतियों को आहार दान)।
{3}
सात व्यसनों का परित्याग~आत्मा के पतन का कारण बनने वाली सात बुरी आदतों का त्याग करना।
द्यूत~जुआ खेलना।
मांस भक्षण~मांस खाना।
मद्यपान~शराब पीना।
वेश्यागमन~कुलटा स्त्रियों के पास जाना।
शिकार~निर्दोष पशुओं का शिकार करना।
चोरी~किसी की वस्तु बिना पूछे लेना।
परस्त्री गमन~परायी स्त्री पर कुदृष्टि रखना या कुसंग करना।
{4}
सात भयों का परित्याग~सम्यग्दृष्टि जीव निर्भय होता है,वह इन सात प्रकार के भयों से मुक्त रहता है।
इहलोक भय~इस जन्म या लोक का भय।
परलोक भय~अगले जन्म या परलोक का भय।
त्राण भय~रक्षा न होने का भय।
अगुप्त भय~अपनी गुप्त बातों या धन आदि के प्रगट होने का भय।
मरण भय~मौत का भय।
वेदना भय~शारीरिक या मानसिक कष्ट/बीमारी का भय
आकस्मिक भय~अचानक होने वाली किसी अनहोनी या दुर्घटना का डर।
{5}
पच्चीस मल दोषों का परित्याग~सम्यग्दर्शन को निर्मल रखने के लिए इन 25 दोषों से दूर रहना आवश्यक है
आठ मद(घमंड)~ज्ञान, पूजा(प्रतिष्ठा),कुल(माता का पक्ष),जाति(पिता का पक्ष), बल,ऋद्धि (वैभव),तप,और शरीर/सुन्दरता का मद।
तीन मूढ़ता~देव मूढ़ता (रागी-द्वेषी देवों को पूजना), गुरु मूढ़ता(परिग्रही भेषधारियों को गुरु मानना)और लोक मूढ़ता(नदी-समुद्र स्नान आदि में धर्म मानना)।
छह अनायतन~कुदेव, कुगुरु,कुशास्त्र और इन तीनों के सेवक/प्रशंसक(इन 6 स्थानों पर आदर-सत्कार न करना)
आठ शंकादि दोष~शंका, आकांक्षा(भोगों की चाह), विचिकित्सा(मुनिराज के मलीन शरीर से ग्लानि), मूढ़दृष्टि(कुमार्गियों की प्रशंसा),उपगूहन(धर्मात्माओं के दोष छिपाना),स्थितिकरण (मार्ग से डिगते हुए को संभालना-इसका अभाव दोष है),वात्सल्य का अभाव,और प्रभावना का अभाव।
{6}
बारह भावनाओं का चिन्तवन~वैराग्य को बढ़ाने के लिए और संसार की असारता को समझने के लिए इन 12 भावनाओं का बार-बार चिंतन किया जाता है~
अनित्य~संसार की सभी वस्तुएं नाशवान हैं।
अशरण~मृत्यु के समय धर्म के अलावा कोई शरण नहीं है।
संसार~यह जीव चार गतियों में भटक रहा है,यहाँ कोई सुख नहीं है।
एकत्व~जीव अकेला ही जन्म लेता है और अकेला ही मरता है।
अन्यत्व~शरीर और आत्मा बिल्कुल भिन्न-भिन्न हैं।
अशुचि~यह शरीर हाड़-मांस-मल-मूत्र से भरा और अपवित्र है।
आस्रव~कर्मों का आत्मा में आना(दुख का कारण)है।
संवर~कर्मों के आने को रोकना(सुख का मार्ग)है।
निर्जरा~पूर्व में बंधे कर्मों को एक-देश अलग करना।
लोक~चौदह राजू उत्तुंग लोक के स्वरूप का विचार करना।
बोधिदुर्लभ~संसार में जैन धर्म और सम्यक्त्व की प्राप्ति अत्यंत कठिन है।
धर्म~उत्तम क्षमादि दस लक्षण धर्म ही सच्चा कल्याणकारी है।
{7}
सम्यग्दर्शन के पाँच अतिचारों का परित्याग~
सम्यग्दर्शन व्रत में आंशिक दोष(अतिचार)न लगने देना
शंका~जिनवचनों में संदेह करना।
काँक्षा~धर्म साधन के बदले लौकिक सुख या भोगों की इच्छा करना।
विचिकित्सा~व्रतियों के मलिन शरीर को देखकर घृणा करना।
अन्यदृष्टि प्रशंसा~ मिथ्यादृष्टियों या कुमार्गियों के ज्ञान/चमत्कार की मन में प्रशंसा करना।
अन्यदृष्टि संस्तव~ मिथ्यादृष्टियों की वचनों से प्रशंसा करना या उनकी संगति करना।
{8}
देव-शास्त्र-गुरु की निर्विघ्न भक्ति~सच्चे देव, शास्त्र और गुरु के प्रति अटूट और निष्कपट श्रद्धा~
सच्चे देव भक्ति~वीतरागी,सर्वज्ञ और हितोपदेशी अरहंत-सिद्ध परमेष्ठी की भक्ति।
सच्चे शास्त्र भक्ति~ वीतराग वाणी(जिनवाणी)का श्रवण,मनन और आदर।
सच्चे गुरु भक्ति~निर्ग्रंथ, निष्परिग्रही,पंचमहाव्रत धारी दिगंबर संतों की भक्ति।
गुणों का कुल योग (Total)~8(मूलगुण)+12 (उत्तरगुण)+7(व्यसन त्याग) +7(भय त्याग)+25(मलदोष त्याग)+12(भावनाएँ)+5 (अतिचार त्याग)+1(देव-शास्त्र-गुरु भक्ति)=77 गुण।
यह 77 गुणों का समूह एक आदर्श श्रावक के आंतरिक आत्म-कल्याण और बाह्य सदाचार के संतुलन को दर्शाता है।
{1}
{2}
{3}
{4}
{5}
{6}
{7}
सम्यग्दर्शन व्रत में आंशिक दोष(अतिचार)न लगने देना
{8}
यह 77 गुणों का समूह एक आदर्श श्रावक के आंतरिक आत्म-कल्याण और बाह्य सदाचार के संतुलन को दर्शाता है।

