जैन आगम के अनुसार कुलकर व ६३ शलाका पुरुष तथा अन्य महा-पुण्य पुरुष
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जैन आगम के अनुसार कुलकर व ६३ शलाका पुरुष तथा अन्य महा-पुण्य पुरुष-
त्रेसठ शलाका पुरूष चतुर्थ काल में होते है ढाई द्वीप की १७० कर्मभूमियों में से १६० विदेह क्षेत्र में सदा चतुर्थकाल रहता है। पांच भरत पांच ऐरावत क्षेत्रों में प्रथम से छठे काल के क्रम से चतुर्थ काल आता है।
चौदह कुलकरों के नाम-
(१) प्रतिश्रुति (२) सन्मति (३) क्षेमंकर (४) सीमंकर (५) सुमधर (६) सीमंधर (७) विमलवाहन (८) चक्षुमान (९) यशस्वी (१०) अभिचन्द्र (११) चन्द्रप्रभ (१२) मरूदेव (१३) प्रसेनजित (१४) नाभिराजा
कुलकरों की पत्नियों के नाम-
(१)स्वयंप्रभा (२)यशस्वी (३)सुनंदा (४)विमला (५)मनोहरी (६)यशोधरा (७)सुमति (८)धारिणी (९)कांतमाला (१०)श्रीमती (११) प्रभावती (१२)सत्या (१३)अभितमति (१४)मरूदेवी
कुलकर ने प्रजा के लिए क्या कार्य किया?
१~पहले कुलकर ने सूर्य चन्द्रोदय से भय मिटाया।
२~दूसरे कुलकर ने अंधकार तथा तारागण से भय मिटाया।
३~तीसरे कुलकर ने हिंसक जन्तुओं की संगति त्याग करने का उपदेश दिया।
४~चौथे कुलकर ने हिंसक जन्तुओं से रक्षण के उपाय बताये।
५~पांचवे कुलकर ने कल्पवृक्ष की सीमायें बताई।
६~छठवें कुलकर ने गुच्छादि चिन्हित सीमायें बताई।
७~सातवें कुलकर ने हाथी आदि की सवारी का उपदेश दिया।
८~आठवें कुलकर ने बालक के मुखदर्शन का उपदेश दिया।
९~नौवें कुलकर ने बालक के नामकरण करने का उपदेश दिया।
१०~दसवें कुलकर ने शिशु रोदन निवारण चन्द्रादि दर्शन का उपदेश दिया।
११~ग्यारवें कुलकर ने शीत आदि से रक्षा के उपाय बताये।
१२~बारहवें कुलकर ने नाव आदि द्वारा गमन करने का उपदेश दिया।
१३~तेरहवें कुलकर ने जरायुपटल को हटाने का उपदेश दिया।
१४~चौदहवें कुलकर ने नाभिनाल कर्तन का उपदेश दिया।
तीसरा काल
सुखमा-दुखमा नाम से आता है उसके समाप्त होने में जब पल्य का आठवां भाग शेष रह जाता है तब कुलकरों की उत्पत्ति प्रारम्भ होती है।
६३ शलाका पुरूष-
२४ तीर्थंकर,
१२चक्रवर्ती,
९ नारायण,
९प्रतिनारायण,
९बलभद्र
ये शलाका पुरूष होते हैं
जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र के वर्तमान काल के१२ चक्रवर्ति~
१~भरत २~सगर ३~मधवा ४~सनत्कुमार ५~शांतिनाथ
६~कुंथुनाथ ७~अरहनाथ ८~सुभौम ९~पद्म १०~हरिषेण ११~जयसेन १२~ब्रह्मदत्त।
९ नारायण के नाम
१~त्रिपृष्ठ २~द्वयपृष्ठ ३~स्वयंभू ४~पुरूषोत्तम ५~पुरूषसिंह ६~ पुरूष ७~दत्त ८~लक्ष्मण ९श्रीकृष्ण।
९ प्रतिनारायण
१~अश्वग्रीव २~तारक ३~मेरक ४~मधुकैटभ ५~निसुम्भ ६~बलि ७~प्रहरण ८~रावण ९~जरासंघ।
सुभौम तथा ब्रम्हदत्त चक्रवर्ती सातवें नरक में गये हैं।मधवा तथा सानत्कुमार चक्रवर्ती कल्पवासी स्वर्गों में गये है। आठ चक्रवर्ती मोक्ष गये है।भरत,सगर, शांतिनाथ, कुंथुनाथ, अरहनाथ, पद्म, हरिषेण जयसेन ये चक्रवर्ती मोक्ष गये हैं।
ढाई द्वीपों में १७० कर्मभूमियों में ६३ शलाका पुरूष होते हैं।अतः उनकी संख्या ६३ गुणा १७०=१०७१० पुरूष।
पांच भरत,पांच ऐरावत क्षेत्रों में तृतीय काल के अंत में कुलकर होते हैं।
जम्बूद्वीप,धातकी खंड तथा पुष्करवर द्वीप के हेमवत तथा हैरणयवत क्षेत्रों में तृतीय काल रहता है वहां काल परिर्वतन नही होते है इस लिए कुलकर नहीं होते हैं।नारायण का दूसरे नाम विष्णु है।प्रतिनारायण को प्रतिविष्णु भी कहते है तथा इन्हें त्रिखंडी भी कहते हैं।
प्रतिनारायण~
जो कर्मभूमि के विजयार्ध के नीचे के तीन खंडों- १~आर्यखंड २~म्लेच्छ खंडों को जीतते हैं वे त्रिखंडी, प्रतिनारायण या प्रतिविष्णु कहलाते हैं।
नारायण~ कौन हौते हे-
जो त्रिखंडी प्रतिनारायण को जीतते हैं तथा प्रतिनारायण के चक्र से उनको ही मार देते हैं वे नारायण या विष्णु कहलाते हैं।
नारायण व प्रतिनाराण का नियोग~
पहले,प्रतिनारायण अपने चक्र रत्न से तीनों खंडो को जीतता है। पुनः नारायण से उसका युद्ध होता है,युद्ध में प्रतिनारायण अपना चक्र चलाते हैं,वह चक्र नारायण की परिक्रमा करके उनके हाथ में आ जाता हैं। उसी चक्ररत्न को नारायण प्रतिनारायण के ऊपर चला देते हैं। जिससे प्रतिनारायण का घात हो जाता है तथा प्रतिनारायण मर कर नरक में चले जाते हैं।नारायण मरकर नरक में उत्पन्न होते हैं।
बलभद्र~ कौन हौते हे-
नारायण के बड़े भाई बलभद्र होते हैं।बलभद्र मोक्ष और स्वर्ग में जाते हैं।
९ बलभद्र~
१~विजय २~अचल ३~धर्म ४~सुप्रभ ५~सुदर्शन ६~ नंदी ७~नंदिमित्र ८~राम ९~बलभद्र
रूद्र ११ होते हैं-
१~भीमावली २~जितशत्रु ३~रूद्र ४~वैश्रवानर
५~सुप्रतिष्ठ ६~अचल ७~पुंडरीक ८~अजितधर
९~अजितनाभि १०~पीठ ११~सात्यकी पुत्र।
सब रूद्र दसवें पूर्व का अध्ययन करते समय विषयों के निमित्त से तप से भ्रष्ट होकर मिथ्यात्व को धारण करते हुए नरकों में चले जाते हैं।
नारद नौ होते हैं
१~भीम २~ महाभीम ३~रूद्र ४~महारूद्र ५~ काल ६~महाकाल ७~दुर्मुख ८~ नरमुख९~अधोमुख
सभी नारद दूसरों को रूलाया करते हैं,वे पाप के निधान कलह प्रिय युद्ध प्रिय होने से नरक जाते हैं।
कामदेव~ किनहे कहते हे-
उस समय के मनुष्यों में जो सबसे सुन्दर आकृति के धारक होते हैं वे कामदेव कहलाते हैं।कामदेव २४ होते हैं।
१~बाहुबली
२~अमित तेज
३~श्रीधर
४~यशोभद्र
५~प्रसेनजित
६~चन्द्रवर्ण
७~अग्निमुक्त
८~सनत्कुमार
९~वत्सराज
१०~कनकप्रभ
११~सिद्धवर्ण
१२~शांतिनाथ
१३~कुंथुनाथ
१४~अरहनाथ
१५~ विजयराज
१६~श्रीचन्द
१७~राजानल
१८~हनुमान
१९~ बलगंज
२०~वसुदेव
२१~प्रद्युम्न
२२~नागकुमार,
२३~श्रीपाल,
२४~जम्बूस्वामी
महापुरूषों के मोक्ष जाने के विषय मे नियम हैं-
तीर्थंकर,उनके माता-पिता,चक्रवर्ती,बलदेव,नारायण, रूद्र, नारद, कामदेव, कुलकर ये सभी भव्य होते हुए नियम से सिद्ध होते है तीर्थंकर तो उसी भव से सिद्ध होते हैं, अन्यों के लिए उसी भव का नियम नहीं हैं।
महापुरूष कुल निम्न हैं-
तीर्थंकर-२४,
तीर्थंकर की माता -२४,
तीर्थंकर के पिता- २४,
चक्रवर्ती -१२,
बलदेव - ९,
नारायण- ९,
प्रतिनारायण- ९,
रूद्र-११,
नारद-९,
कामदेव-२४,
कुलकर-२४

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जैन आगम के अनुसार कुलकर व ६३ शलाका पुरुष तथा अन्य महा-पुण्य पुरुष - by FDArchitects - 05-03-2026, 05:11 AM

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